माना कि अब बड़े हो गये

माना कि हम बड़े हो गए,

पर बचपन अभी तो ज़िन्दा है।

सफ़ेद हुए इन बालों के पीछे

एक नन्हा परिंदा ज़िन्दा है॥

वो मिट्टी में खेलना अपना,

वो पेड़ों पर चढ़ जाना;

नदी किनारे कंकड़ चुनकर

थैले में भर घर ले आना।

गली-मोहल्ले में खेल-कूद,

नंगे पाँव भाग निकल जाना

धीमी हुई कदमों की रफ़्तार,

पर मन की चाल अभी ज़िन्दा है।

माना कि हम बड़े हो गए

माँ की प्यार-भरी पोटली,

पापा की सख़्त मगर मीठी सीख;

दूरी ने कितना बदल दिया,

पर मन अब भी वही बेसीख।

उनकी झिड़की, उनका दुलार,

दिल में आज भी बसा हुआ;

चेहरे पर भले झुर्रियाँ हों,

पर वो बचपन आज भी हँसा हुआ।

माना कि हम बड़े हो गए

गली-मोहल्ले की टोली अपनी,

जिसमें हँसी लहराती थी;

कंचों की खनक, गिल्ली-डंडा,

हर जीत कहानी बन जाती थी।

अब सब छूटे, सब दूर गए,

फिर भी मन में पास खड़े

दिल कहता है उन राहों में

आज भी वैसे ही पड़े।

माना कि हम बड़े हो गए

फिर आया यौवन का मौसम,

जब सपनों का रंग गहराया;

पर बचपन का साया साथ खड़ा,

हर डर को उसी ने भुलाया।

घर–परिवार बनाए हमने,

संतानें पनपी, घोंसला भरा;

पर भीतर का बच्चा अब तक

हमको ही समझाता रहा

बचपन अभी तो ज़िन्दा है,

माना कि हम बड़े हो गए

आज सफ़र लम्बा तय कर आए,

थकावट थोड़ी बोलती है;

पर यादों की पगडंडी मन में

पहले जैसी ही दौड़ती है।

आँगन सूना, आवाजें कम,

पर दिल में वही चहल-पहल;

समय ने केवल तन को बदला,

मन में अब भी वही हलचल।

माना कि हम बड़े हो गए

जो बीता है, वही जीवन है;

जो याद रहे, वही गीत बने।

हम चलकर थक भी जाएँ,

पर बचपन के पंख अनंत रहें।

यही हमारी पूँजी, यही पहचान

उस मधुर, निर्मल नेह में

जीवन पाता नई उड़ान।

माना कि हम बड़े हो गए

पर बचपन अभी तो ज़िन्दा है।

सफ़र भले ही लंबा हो गया,

पर मन का परिंदा ज़िन्दा है॥

Leave a Comment