माँ सीता का विरह गीत

बोलो जय सियाराम, जय जय सियाराम,

जहाँ सीता वहाँ राम, जहाँ सीता वहाँ राम।

सीता बिन शून्य राम, बोलो जय सियाराम॥

बोले राम हे सौमित्र, मन का भार न सहूँ,

राजधर्म का बंधन भारी, किन्तु वचन न कहूँ।

जनकसुता पर लगा कलंक, जग ने उठाई बात,

राम का हृदय रोता भीतर, विवश बना विधात॥

जिस सीते के लिए किया रावण का संहार,

जिस सीते के लिए त्यागा अयोध्या का सिंगार।

आज उसी पर जग ने डाली, संदेह की रेखा,

राम विवश, धर्म के खातिर, कर न सके लेखा॥

वन की राह चले सौमित्र, रथ के चक्के रोये,

आँखों में अश्रु समुंदर, मन के बादल खोये।

माँ को देख न बोल सके, कंठ हुआ निष्प्राण,

प्रभु की आज्ञा का दास बना, हृदय हुआ विह्वल प्राण॥

सीता बोली वन देवी से मां कब तक परीक्षा होगी?

कब तक नारी को अपवित्र कह, दुनिया दोष देगी?

अग्नि-परीक्षा दे चुकी हूँ, फिर भी दोष हमारा,

अब और नहीं सहूँ यह जग का कठोर किनारा॥

माँ ने धरती से कहा“मुझे अब गोद बुला लो,

मैं तो तेरी ही सुता हूँ माँ मुझको गले लगा लो

लव-कुश मेरे उज्ज्वल दीपक, जग में सत्य बताएँ,

माँ का निर्मल चरित सुनाकर, राम का मान बढ़ाएँ॥

धरती फटी, जननी समाई, आकाश हुआ निस्तब्ध,

राम खड़े रह गए अकेले, मन हुआ अधीर संतप्त

सीता बिन जीवन शून्य, श्वास अधूरी जान,

जहाँ सीता वहीं तो राम, यही सनातन गान॥

बोलो जय सियाराम, जय जय सियाराम,

जहाँ सीता वहाँ राम, जहाँ सीता वहाँ राम।

सीता-राम, सीता-राम,जय जय सियाराम॥

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