मैं कोई कवि नहीं

मैं कोई कवि नही हूँ न मैं कवि कहलाना चाहता हूँ

लिखता रहता मन की बातें मन की बात सुनाता हूँ ।

छंद विधान मुझे न भाये न मैं इसकी राग अलापता हूँ

सच्चाई पर मेरी लेखनी चलती भाट राग न सुनाता हूँ ।

भूखे पेट बच्चों को देखता उन पर द्रवित मैं हो जाता हूँ

देकर कुछ टाफी बिस्कुट खेल खिलौने मन ही मन मैं हर्षाता हूँ

दीन दुखियों की पीड़ा में मेरा मन उलझा रहता है

कैसे बदले उनकी जिंदगी यही सोचता रहता हूँ ।

दीमक जैसे भ्रष्टाचारी देश को हमारे चाट रहे

मामूली सा एक तनख़्वाहिया नोटों की गड्डियों पर सो रहे

पकड़े जाते हैं जब ये लुटेरे कहते मुझे सताया जाता है

लेखनी मेरी उन पर है चलती उनकी कलई खोलता हूँ ।

हर सड़क हर चौराहों पर गिद्धों की मंडली बैठी है

बहन बेटियां सड़क पर जाती उनकी आँखें चमकती हैं

कब तक रहोगे भीष्म पितामह कब तक मूकदर्शक बने बैठोगे

लेखक हो लेखक का कर्तव्य करो तभी लेखनी चमकती है

नर नहीं नर पिशाच हैं ये निशाचरी इनकी प्रवृत्ति है

कैसे न चले कलम इन पर बेबस स्वयं को पाता हूँ ।

Leave a Comment