क्या करें इस धन दौलत का

क्या करें इस धन-दौलत का, जब अपने साथ न हों,

जीवन की इस राह पे जब कोई भी पास न हों॥

घर आँगन तो हैं चमकते,

दीवारें हैं ऊँची-ऊँची,

पर मन का आँगन सूना है,

ना हँसी, ना कोई ऊँची।

सुनता हूँ अपनी ही धड़कन,

जैसे कोई पुकार कहीं,

धन के सागर में डूब गया,

मन का मोती पार नहीं॥

क्या करें इस धन-दौलत का, जब अपने साथ न हों,

जीवन की इस राह पे अब, कोई भी पास न हों॥

कभी था मन सपनों से भरा,

हर दिन में थी रौनक नई,

अब तो दिन बस ढल जाते हैं,

ना उम्मीद, ना चाह वही।

रिश्तों की डोरें ढीली हैं,

संवेदनाएँ मौन हुईं,

खुशियों की बातें अब जैसे,

बीते युग की बात हुईं॥

धन, वैभव, मान-सम्मान सब,

क्षणभंगुर हैं, मृगतृष्णा हैं,

जिसे समझे थे सुख का स्रोत,

वो भी अब बस कल्पना है।

सुख वहीं है, जहाँ अपनापन,

जहाँ करुणा की छाँव मिले,

जहाँ हृदयों में प्रेम खिले,

और भगवान का नाम मिले॥

क्या करें इस धन-दौलत का, जब अपने साथ न हों,

जीवन की इस राह पे अब, कोई भी पास न हों॥

प्रभु तेरे चरणों में रख दूँ,ये जीवन का सब भार मैं,

मिट जाएं ये मोह माया सब,बस तेरा ही दरबार मैं॥

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