कुम्हार और माटी

तोड़ दी माटी की चिलम

माटी हो गयी नाराज़

माटी बोली ऐ कुम्हार

तेरी क्या मति हुई बेकार ।

बोला कुम्हार ए प्यारी माटी

मति में तो हुई अब मेरे सुधार

मैंने बदला अपना फ़ैसला

अब होगा सुराही का निर्माण ।

माटी की बाँछें खिली खिली

हो गयी वह उस पर निहाल

बोली मति तो हुई मेरी बेकार

हे कुम्हार तू निकला समझदार ।

तूने तो बदली मेरी ज़िन्दगी

जीवन को मेरे दिया निखार

बनकर सुराही शीतलता दूँगी

मुझको मिला अद्भुत उपहार ।

चिलम बनती तो खुद भी जलती

दूसरो को भी देती अंगार

तूने लिया एक अच्छा फ़ैसला

कैसे उतारूँ मैं तेरा उपकार ।

ख़ुश रहना और ख़ुशियाँ बाँटना

तुझसे तो सीखे संसार

तू तो निकला मेरा मसीहा

तेरा हृदय है बहुत उदार ।

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