कोयल बोले

मनमोहक वायु डोल रही है ,

डालों को झकझोर रही है ,

आम के घने पत्तों में छिपी बैठी है

काली कोयल बोल रही है ।

रंग रूप से तो काली है

पर बोली उसकी निराली है

फुदकती है वह डाली डाली,

मीठे आम में मिश्री घोल रही है ।

कौआ कोयल तो एक जैसे हैं,

देखने में समान ही लगते हैं ,

पर वाणी का ही तो अंतर है

शहद में शक्कर घोल रही है ।

कोयल बहुत ही प्यारी होती है

चिड़ियों की रानी कहलाती है,

बागों की तो वह रौनक़ है,

डाल डाल पर डोल रही है ।

कुहू कुहू जब वह बोलती है

सब उसकी बोली दुहराते हैं,

वह और मग्न हो जाती है,

गले से सुन्दर राग सुनाती है ।

खुद का घोंसला नहीं बनाती है,

कौये के घोंसले में अंडे रख आती है,

बसंत रितु में वह खूब दिखती है,

अकेले रहना पसंद करती है ।

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