कन्या भ्रूण की वेदना

मैं अधखिली कली हूँ तेरी बगिया की

मुझको पापा नही कुचलो तुम

घर आंगन बगिया महकाऊँगी

असमय गर्दन न मोड़ो तुम !!

अभी तो मैं एक कन्या भ्रूण ठहरी

प्राणों का भी ठीक से नही संचार हुआ

समझ ली पर आपके हृदय की मंशा

आप दोनों को मेरी नहीं ज़रूरत है .

भला दोष इसमें है क्या मेरा

मैं भी तो तेरे अंश का हिस्सा हूँ

रक्त मांस से तेरे सृजित हो रही

अभी तो आधी अधूरी विकसित हूँ.

नन्हें हाथ पाँव भी नहीं बने मेरे

हाँ दिल की धड़कन मुझे मिली

आँखों से कुछ नहीं दिखता है

घुप अंधेरे में हूँ जैसी पड़ी हुई ..

मत मारो मुझे मेरे मम्मी पापा

बहुत ही दर्द से मैं गुजरूँगी

मृत्यु जैसी भयानक पीड़ा को

नन्हीं मुन्नी मैं कैसे सह पाऊँगी .

आने तो मुझे इस धरती पर पापा

हर ख़ुशियाँ मैं तुमको दूँगी

तुम तो प्यारे मम्मी पापा मेरे

प्लीज़ प्लीज़ मुझे मत मारो

महक सजाऊँगी घर आँगन

मत मेरा बहिष्कार करो

ठुमक ठुमक कर दौड़ूँगी

गले में आपके लिपटूँगी ..

नही देना खेल खिलौने

न पहनाना मुझे अच्छे कपड़े

टाफी तक मैं नहीं माँगूँगी

जो भी खिलाओगे मुझको

ना नुकुर बिलकुल न करूँगी

दे दो मेरे प्राणों की भिक्षा

पुत्री धर्म मैं पूरा निभाऊँगी

भैया से मैं कमतर न रहूँगी

आगे बढ़कर दिखाऊँगी

खूब पढ़ूँगी खूब लिखूँगी

आपका मान बढ़ाऊँगी

पहचानेंगे आपको सभी मेरे नाम से

अवसर मिला तो मैं भी एक दिन

कल्पना चावला जैसी बन जाऊँगी ..

एक ही माँग है आपसे मेरी

प्लीज़ प्लीज़ मुझे मत मारो

असमय गर्दन न मोड़ो तुम

मैं अधखिली कली हूँ तेरी बगिया की

मुझको पापा नही कुचलो तुम ॥॥

Leave a Comment