लोग कहते हैं छंद विधान में आप नहीं बँधते हैं
आपकी कविता अधूरी है,
मैं कहता हूँ कि क्यों पड़ूँ पचड़े में
जो लिखता हूँ कसौटी पर खरा होना ज़रूरी है ।
शौक़ नहीं है मेरी मैं प्रतिष्ठित कवि बन जाऊँ
पर मन की पीड़ा को रचना में मैं उतारता हूँ।
लिख देता मन की वेदना तब शांति मुझे मिलती है
छंद विधान में नहीं बँधता मन की बात सुनाता हूँ ।
कैसे न लिखूँ उन बच्चों की वेदना
जो भूखे पेट सोते हैं,
नहीं मिलती दो जून की रोटी
रोते विलखते रहते हैं,
कैसे न लिखूँ उस माँ की वेदना
जो अपने बच्चे को भूखे पेट सुलाती है
कैसे रुक सकती मेरी कलम
ये बहुत ही नाइंसाफी है ।
कैसे न लिखूँ उस सैनिक की वेदना
जो धरती माँ की रक्षा में जान गँवाता है,
कैसे न लिखूँ उस पत्नी की वेदना
जिसका सिंदूर उजड़ जाता है ।
कैसे ने लिखूँ जयचंदों के चरित्र पर
जो अपनी सेना का मनोबल गिराते हैं,
आस्तीन के सांप हैं वे हमीं को काटते हैं
मैं इन गद्दारों की कलई खोलता रहता है
इसीलिए अपनी कविता को हथियार बनाता हूँ ।
कैसे न लिखूँ उन भ्रष्टाचारियों पर
जो गरीब जनता के धन पर राज करते हैं,
सोते हैं नोटों की शैय्या पर
पर फिर भी भूख नहीं मरती है ।
कैसे न लिखूँ उस काले धन पर
जिस पर नेता शान बघारते हैं,
कैसे न लिखूँ उस धन के बल पर
जिस पर गुंडे निर्वाचित होते हैं ।
कैसे न लिखूँ उस नारी पर
जिसकी चौराहे पर इज्जत लुटती है
वीडियो बनाते हैं कायर नवयुवक
अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हैं
धिक्कार हैं उनके जीवन को
जो बहनों की अस्मिता लूटते देखते हैं
आज के वे दुशासन हैं
जो द्रौपदी की चीर हरण करते हैं ।
कलम ही तो है हथियार हमारी
कवि की लेखनी जब चलती है
आगे पीछे नहीं सोचता
बड़े बड़े गद्दारों की कलई ये खोलती है ।
नहीं रुक सकती लेखनी मेरी
ये अत्याचार सहन नहीं होता है
लेखनी ही है मेरा हथियार
जिसका संधान मैं करता हूँ !