कैसे कहूँ मैं कवि हूँ
पूरी वर्णमाला तक तो याद नहीं
व्याकरण का पता नहीं
अपना लिखा भी भूल जाता हूँ
ठोक पीटकर जो गढ़ते हैं
उनमें से मैं हूँ नहीं,
कैसे कहूँ मैं कवि हूँ ।
अन्तर्मन के मेरे शब्द मेरे बच्चों की तरह हैं
जो समय पाकर बढ़ते रहते हैं
नाराज़ होकर अपना अलग घर बना लेते हैं
गुस्से से मुझे छोड़ कर चले जाते हैं
पर मेरे भीतर ज़रूर कोई खूबी या
कोमलता रही होगी
वही शब्द बड़े होकर मेरे पास आ जाते हैं
नयी लय, नये भाव, नये उमंगों के साथ
उन्हीं शब्दों को लेखनी में मैं पिरोता हूँ
और कहता हूँ कि कवि हूँ ।
कितनी सूनी है मेरी यह कविता
मेरे शब्द कितने उदास
अर्थ हीन, व्याकरण हीन,
नीरसता का आवरण ओढ़े हुये
जहां कोई चाह नही, कोई रस नही,
उदास मन लिये किसी कोने में छिपे बैठे
मुक्ति गीत को सुनता हूँ कान लगाये,
शब्दों के रुदन का संगीत भेदता है आत्मा को
तब कुछ अस्फुट शब्द बुदबुदाने लगते हैं
उन्हीं को संजोता हूँ उन्हीं का सृजन करता हूँ ।
हां मैं एक ऐसे कवि की तलाश
में जरूर घूम रहा हूँ
जो देख ले समय के बहुत पहले
आगे आने वाला काला सच
अदृश्य शिराएँ काले विचारों की,
आगाज कर दे तूफ़ान आने से पहले
मानवता को बचा ले भीषण नरसंहार से
बच्चों के रुदन और चीत्कार से,
अमन शांति धरती पर फैले
वहीं कहे मैं कवि हूँ.