लुप्त हो गयी वह
इतिहास के पन्नों में.
प्यारी चिट्ठियाँ...
छोटा सा पीला पोस्ट कार्ड,
नीली अन्तरदेशी
लिखने का ज़बर्दस्त सलीका.
जिसकी शुरुआत होती थी
“ऊं गणेशाय नमः “ ऊं परमात्मने नमः से.
परम पिता परमेश्वर की असीम कृपा से
यहाँ सब कुशल है
आशा है वहाँ पर सब कुशल से होगे .
भगवान की कृपा सब पर बनी रहे.
चिट्ठी के मध्य में लिखा जाता था
रिश्ते दार, घर गाँव की पूरी खबर,
बच्चों की पढ़ाई और फ़ीस की माँग..
खेती का पूरा हाल-चाल
ओला बारिश से फसल को नुक़सान
घर में चाहे सब बीमार हों
परन्तु यहाँ सब कुशल है .
बेटा चिंता मत करना
आराम से रहना .
हाँ सब तुम्हारी बहुत याद करते हैं ..
कब घर आओगे.
कितना कुछ सिमट जाता था
एक नीले से कागज में....
चिट्ठी का इंतज़ार रहता था
उस नवयौवना को
जिसका पिया परदेश कमाने गया है
भाग कर सीने से लगाती
अकेले में आंखों से आंसू बहाती.
चिट्ठी के अंत में समापन होता था
लिखा कम समझना ज़्यादा
त्रुटि हेतु क्षमा प्राथी
मां की आस थी वह चिट्ठियाँ
पिता का संबल थी वह चिट्ठियाँ
बच्चों का भविष्य बताती थी वह चिट्ठियाँ
गांव का गौरव थी वे चिट्ठियाँ ..
डाकिया चिट्ठी लाएगा
वह बांच कर सुनाएगा.
देख देख चिट्ठी को
कई कई बार छू कर चिट्टी को
अनपढ़ भी एहसासों को पढ़ लेते थे .
भागकर कुछ पढे लिखे बच्चों से
चिट्ठी चुपके से पढ़वाते थे
कहीं कोई गुप्त बाते
गाँव में न फैला दे
आत्म सम्मान की बात थी
अब तो स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता है
अक्सर ही दिल तोड़ता हैं
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो
सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता है
सब कुछ सिमट गया छै इंच में
जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में
जज्बात सिमट गए संदेशों में..
चूल्हे सिमट गए गैसों में,
और इंसान सिमट गए पैसों में
रिश्ते अब बेमानी हैं ..
रक्त हो गया पानी है.