जीवन सत्य गीत

जीवन इक धारा है,

धारा है बहता आए बहता जाए,

आता रहता जन्म नया, इसी में डूबे उतराये

जीवन इक धारा है।।

छुरी गले पर चल रही, फिर भी दया न आज,

अहम् में जीवन जी रहा, जैसे हो स्थायी राज।

ईश्वर की सृष्टि में, सबको समान अधिकार

निर्बल पर जो दया करे, वही सच्चा कृपाण।।

मरते प्रतिदिन लाख यहाँ, सब रच जाते चाह,

भव्य महल हो नाम रहे, फिर भी खाली राह।

तन तो रह जाता यहीं, श्वास ही केवल जाए

कर्मों की गठरी संग लिए, जन्म नया फिर लाए।।

माया रस्सी बाँध गई, मन भटके दिन-रैन,

टूटे जब यह मोह-बंधन, मिलता आत्म-चैन।

अंतर में जब ज्योत जगे, मिट जाता अंधियार

खुल जाते हैं मोक्ष-द्वार, छूटे हर व्यापार।।

सृष्टि ईश्वर की एक है, सब हैं एक समान,

न कोई छोटा जन्म से, न कोई महा-प्रधान।

स्नेह बाँटे जो सभी में, वही नर-श्रेष्ठ कहलाए

ईश्वर का आशीष वही, जीवन सफल बन जाए।।

कर्मों का ही फल यहाँ, लिखता जीवन-पंथ,

जो जैसा बोए जगत में, वैसा पाए अंत।

लोभ-मोह रह न सकें, जब टूटे संशय-सत्य

सत्कर्मों की रोशनी ही, जीवन का केवल पथ्य।।

आया था मैं मौन ही, जाऊँगा भी मौन,

बीच यही कुछ श्वास हैं, बस इतना है कोन।

प्रेम, दया और सत्य से जो जीवन सजाए

धरती पर ही स्वर्ग उसी का, जन्म कृतार्थ बन जाए।।

सद्गुण यदि संग हों तन-मन न डगमगाए

सद्गुण यदि संग हों पार मनुष्य उतर जाए।।

जीवन इक धारा है, धारा है बहता आए बहता जाए,

आता रहता जन्म नया, इसी में डूबे उतराये

जीवन इक धारा है।।

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