जीवन का यथार्थ

जीव तो पराधीन होता है,

ईश्वर के समान स्वतंत्र नही,

काल चक्र के पहिये में

एक दिन विलुप्त हो जाता है ।

समस्त संग्रहों का अंत विनाश है,

लौकिक उन्नतियों का अंत भी है पतन,

वृक्ष के पके हुये फल का

पतन ही तो अंततः होता है ।

संयोग का अंत वियोग है,

जीवन का अंत मरण होता है,

मानव को मृत्यु के सिवाय,

अन्य कोई भय भी तो नही होता है ।

जो रात बीत जाती है,

लौटकर कहाँ आती है,

मौत साथ साथ चलती है

साथ साथ बैठती है ।

जिस मार्ग से पूर्वज गये है,

उसी मार्ग पर सबको जाना है,

नदियों का सतत प्रवाह

कभी पीछे नही लौटता है ।

गुजरा हुआ समय

कभी पुनः नहीं आता है,

मानव तन को सत्कर्म में लगाये,

यही जीवन का धर्म होता है ।

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