इक झाड़ी को देख रहा था
झाड़ी मुझसे कहती है
क्यों डरते हो तुम मुझसे
कि मेरे अंदर काँटे हैं
मत डरो मेरे काँटों से
ये मेरी सुरक्षा करते हैं
आओ बैठो मेरे पास
मन की शांति मैं तुमको दूँगी
स्वादिष्ट फल हैं मेरे पास
उनको खाने को दूँगी ।
पर तू मानव तो बहुत चतुर है
जड़ से मुझे काटता है
मेरी जड़ों में कंकड़ पत्थर भरता
पर हरियाली मुझसे चाहता है,
बड़ी बड़ी अट्टालिकाओं को
मुझ पर खड़ी कर देता है
सामर्थ्य दिखाता है अपनी
पर स्वयं की हानि तू करता है ,
वापस आयेगा इक दिन तू मेरे पास
पर मैं तो न रहूँगी
तड़पेगा तरसेगा पर
तुझे देने को मैं न रहूँगी ।