जनमेजय व्यास संवाद

व्यास कहे जनमेजय से होनी का यह गूढ़ विधान,

कर्म हमारे हाथों में हैं, फल पर नहीं हमारा मान।

अभिमन्यु के वंश में जन्मे, राजा परीक्षित वीर,

उनके पुत्र जनमेजय, तेजस्वी, साहसी, गंभीर।

अहंकार का बादल छाया, मन में उठा अभिमान,

व्यास वचन पर प्रश्न किया, भूल गया वह ज्ञान ।

बोले राजा गर्व में आकर, “मैं होता उस काल,

महाभारत का रण रुक जाता, न बहता रक्त का जाल।

जहाँ कृष्ण, भीष्म, द्रोण खड़े थे, धर्मराज महान,

फिर भी युद्ध हुआ क्यों मुनिवर, कहो मुझे यह ज्ञान?”

व्यास हँसे करुणा से बोले, “पुत्र न कर संदेह,

जो विधि लिख चुकी भाग्य में, टलता नहीं वह लेख।

यदि टलता होता तो कृष्ण ही, रोक लेते संहार,

तू पुरुषार्थ का गर्व न कर, समझ नियति का सार।”

राजा बोला “मैं न मानूँ, दिखाओ मुझको प्रमाण,

भविष्य कहो, मैं रोक दिखाऊँ, झूठा होगा विधान।”

व्यास कहें “सुन पुत्र ध्यान से, वर्ष बीतेंगे चार,

काले घोड़े पर शिकार करेगा, दक्षिण दिशा अपार।

समुद्र तट पर नारी मिलेगी, रूप का होगा मान,

महल लाएगा, विवाह करेगा, रोकेगा कोई न ज्ञान।

कहूँगा यज्ञ वृद्धों से कराना, पर तू न माने बात,

युवा ब्राह्मण यज्ञ करेंगे, होगी बड़ी घात।

रानी के कहने पर करेगा, अधर्म भरा प्रहार,

ब्रह्महत्या का पाप लगेगा, कोढ़ बनेगा हार।

यही रोग तेरी मृत्यु बनेगा, रोक सके तो रोक।”

राजा हँसकर बोला मुनि से, “काला घोड़ा न लूँगा,

शिकार को न जाऊँगा, विधि को जीत दिखाऊँगा।”

पर होनी जब द्वार पर आई, मन हुआ व्याकुल आज,

अस्तबल में काला घोड़ा, और न कोई साज।

दक्षिण न जाऊँ सोचा मन में, घोड़ा उधर ही धाय,

समुद्र तट पर वही नारी, मोह जाल फैलाय।

सोचा विवाह न करूँगा, पर प्रेम जाल में बँध,

रानी बनी वही सुंदरी, टूटा संयम, टूटा बंध।

यज्ञ हुआ, युवा ब्राह्मण आए, हँसी हुई एक बार,

रानी क्रोधित, राजा अंधा, दे बैठा प्राणहार।

कोढ़ चढ़ा तन पर राजा के, टूट गया अभिमान,

दौड़ा आया व्यास शरण में, रोकर मांगे प्राण।

व्यास कहें “एक अवसर अंतिम, जीवन अभी शेष,

श्रद्धा सहित महाभारत सुन, मिटेगा तेरा क्लेश।

पर यदि एक भी क्षण अविश्वास, कथा वहीं रुक जाए,

फिर मेरा भी बल न चलेगा, जीवन हाथ से जाए।”

श्रद्धा से कथा सुनी राजा ने, गलता गया रोग,

भीम बल का जब वर्णन आया, डोले मन का योग।

हाथी उठे अंतरिक्ष गए, बोले राजा चौंक,

“यह कैसे संभव मुनिवर, मैं इसे न मानूँ लोक!”

व्यास ने कथा वहीं रोक दी, बोले करुण स्वर में,

“पुत्र, यही तो कहा था मैंने, मत लाना संशय मन में।”

मंत्र शक्ति से हाथी उतरे, धरती काँप उठी,

श्रद्धा जितनी थी तेरे मन में, उतनी मुक्ति मिली।

एक बिंदु रह गया अविश्वास का, वही बना मृत्यु द्वार,

सत्य यही है जगत में, समझ ले जीवन सार।

भजन का सार (अंतिम पद)

कर्म हमारे हाथों में है, फल प्रभु के अधिकार,

हम तो केवल निमित्त हैं, कर्ता वही करतार।

होनी टलती नहीं कभी भी, यह शाश्वत है ज्ञान,

श्रद्धा, नाम, सुकर्म से, हल्का हो उसका भार महान।

गीता बोले कृष्ण अर्जुन से, “उठ कर कर तू कर्म,

ये सब पहले ही मारे गए, तू तो निमित्त धर्म।”

नाम बिना न मुक्ति मिले, न कटे अहंकार,

श्रद्धा से जो शीश झुकाए, वही भव से पार।

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