जब भक्ति लेखनी बन जाए
प्रभु का नाम ही ध्यान में आए,
शब्द बने सब गीत सुहाने
मन-मंदिर में दीप जलाए॥
ना यश की, ना धन वैभव की चाह
बस चरणों में मिले ठिकाने,
तेरे नाम का अमृत पीता रहूँ
तेरी भक्ति में दिन बिताने॥
हर अक्षर में तेरा निवास प्रभु,
हर पंक्ति तेरी महिमा गाए।
भाव-भाव में तेरा आभास हो,
मेरा मन बस तुझमें समाए॥
हर साँस तेरा ही गुणगान करे
तेरे स्वर से बँधे ये प्राण,
तेरे ध्यान में मग्न रहे मन
हर पथ हो तेरा ही ज्ञान॥
हर कविता तेरी वाणी हो,
हर छंद तेरा ही गान।
मुझमें तू ऐसे बस जाए,
जैसे दीप में बाती जान॥
जो लिखा जाए वो पूजा बने
शब्दों में तेरा रूप समाए,
तेरे बिना ये जग सूना लगे
तेरी स्मृति ही सुख दिलाए॥