कहाँ से आती हो तुम, हिचकियाँ?
ज़रा बता तो सही
तुम कौन हो?
सुना है तुम संकेत देती हो,
किसी के दिल की पुकार लाती हो।
कहते हैं कोई मुझे याद करता है,
मेरे लिए मन ही मन फ़रियाद करता है।
तो फिर तुम तो मेरी मित्र हुई,
मेरी शुभचिंतक हुई।
जाकर कह दो उस अनजाने को
मैं भी उसे उतना ही प्यार करता हूँ।
जब आत्मा से आत्मा जुड़ती है,
तो ऐसे संदेश मिलते हैं।
प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं जातीं,
वे कल्याण का मार्ग बनाती हैं।
सपने भी सब झूठे नहीं होते
ब्रह्ममुहूर्त के सपने अक्सर सत्य हो जाते हैं।
मन का चिंतन, प्रभु की सुनवाई
कहीं तुम प्रभु की संदेशवाहक तो नहीं?
जैसी भी हो तुम,
आया करोन शरमाया करो।
तुम्हारे आने से अच्छा लगता है,
मन को सोचने पर मजबूर करती हो
कि वह कौन होगा
जो इस क्षण मुझे याद कर रहा है।
इसी बहाने मैं सबको याद करता हूँ।
तुम मेरी सच्ची मित्र हो,
मेरी आत्मीय साथी।
ऐ मेरी दोस्त, हिचकियाँ
तुम आया करो
ज़रूर आया करो।
आप