ग्राहक अस्पताल में पहुँचता है,
पार्किंग में गाड़ी खड़ी करते ही
इलाज शुरू हो जाता है।
जितनी बड़ी गाड़ी,
उतना बड़ा रोग,
और उतनी ही बड़ी फ़ीस
वैज्ञानिक सिद्धांत है जनाब!
अंदर घुसते ही
“मे आई हेल्प यू”
ऐसी मुस्कान बिखेरता है,
जैसे आपकी बीमारी नहीं,
आपकी लिमिट देखकर खुश हुआ हो।
आजकल बीमारी नहीं,
ग्राहक अस्पताल पहुँचता है,
नब्ज़ बाद में देखी जाती है,
पहले पूछा जाता है
मेडिकल इंश्योरेंस या कैश?
पंजीकरण कराइए,
फ़ीस भरिए,
अब आप मरीज नहीं
परिवार के सदस्य हैं,
हाँ हर मुलाक़ात
का बिल देय होता है ।
डॉक्टर से पहले मशीनें मिलेंगी,
क्योंकि यहाँ
जो दिखता नहीं,
वह माना नहीं जाता।
पूरा शरीर स्कैन कराइए
कुछ न कुछ निकलेगा,
न निकले तो
रिपोर्ट बना ली जाएगी।
वेटिंग रूम फाइव स्टार,
मरीज सेकेंड क्लास,
चाय-नाश्ता मुफ्त है साहब,
इलाज की कीमत में
सब एडजस्ट है खास।
अगर इंश्योरेंस है
तो आप VIP हैं,
वरना बीमारी को
थोड़ा कंट्रोल में रखिए,
क्योंकि बजट भी
एक मेडिकल कंडीशन है।
दुआ करिए
कोई बड़ी बीमारी न निकले,
आई.सी.यू. में न जाना पड़े,
वेंटिलेटर की सेवा न लेनी पड़े।
यहाँ धड़कनें
मशीनें गिनती हैं,
आप आए अपनी मर्ज़ी से हैं,
पर जाएँगे
डॉक्टर की मर्ज़ी से
ज़िंदा या मुर्दा।
यह अस्पताल है जनाब,
यहाँ दुआ से ज़्यादा
डिस्काउंट काम आता है,
और स्वस्थ वही माना जाता है
जो बिल चुकाकर
मुस्कुराता है।
इलाज हो या न हो,
अनुभव ज़रूर मिलेगा
और जाते-जाते
दिल से बस एक आवाज़ निकलेगी
“वाह!
बीमारी महँगी थी,
पर व्यवस्था लाजवाब थी।” 😄