विपत्ति पड़ी है बहुत ही भारी
हे कान्हा तुम अब आ जाओ
विपत्ति पडी है बहुत ही भारी, त्रसित हो रहे सब नर नारी
राक्षसों की भीड़ खड़ी है, विध्वंस कर रहे दुनिया सारी
एक द्रौपदी ही नहीं धरा पर,चहुँओर चीर हरण हो रहा है
चीत्कार कर रही अबला सारी, नारी की लाज बचा जाओ
पार्थ हुये निष्क्रिय आज हैं
मोह पाश से छुड़ा जाओ
दुर्योधन खड़ा अट्टहास कर रहा, जाँघों पर ताल दे रहा
दुशासन घर घर बैठे हैं, पाप सर पर चढ़ कर बोल रहा
मूक दर्शक सब बने हुये है, धर्म हो रहा लुप्त प्राय
अधर्मियों की फ़ौज खड़ी है, धर्म का मार्ग दिखा जाओ
धर्महीन, पुरुषत्व हीन, हुए आज नर हैं
उनको पाठ पढ़ा जाओ .
पार्थ दिग्भ्रमित रथ पर बैठा है, गांडीव में वह बल नही
कर्म के पथ पर चलने को, गीता का पाठ सुना जाओ
प्रेम का सागर हो तुम कान्हा,राधा के हृदय प्रेम की डोरी
व्रज तुम बिन सूनी पड़ी है, अपनी बांसुरी बजा जाओ
मंत्रमुग्ध कर दो प्रकृति को
अपनी नर लीला दिखा जाओ
ज्ञानियों के तुम चिंतन हो, चेतना के बिन्दु चिंतन
कैसे लिखूँ आप पर कान्हा, परिभाषा स्वयं बता जाओ
अचेतन को चेतन कर जाओ
नींद से उन्हें जगा जाओ..