हे हरि नित आपके गुण गाऊँ

हे हरि! नित आपके गुण गाऊँ,

प्रभु चरणों में मन बसाऊँ।

नीलमणि-सा श्याम सुहावन,

पीतांबर में रूप अलौकिक।

कोटि मदन सा मोहक सौंदर्य,

दर्शन पा तृप्ति मैं पाऊँ॥

लाल कमल समान नेत्र,

मधुर मनोहर चितवन तेरी।

सुन्दर कपोल, शंख ग्रीवा,

बलिहारी छवि अनुपम तेरी॥

शंख, चक्र, गदा, कमल धारे,

मुकुट, कुंडल, तिलक उजियारे।

हृदय वनमाला, श्रीवत्स अंकित,

महिमा गाऊँ दिन और रातें॥

चन्द्र किरण सी मधुर मुस्कान,

कर में कंकन, रत्न सुशोभित।

वाम अङ्ग श्री लक्ष्मी विराजित,

गाउँ महिमा, मन अनुरंजित॥

हे हरि! नित आपके गुण गाऊँ,

प्रभु चरणों में मन बसाऊँ॥

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