गीत कर्म का दीप

हे प्रभु! न किसी को पीड़ा दूँ, न मैं कोई पाप करूँ,

मानव तन पाया जो मैंने, पूर्ण सार्थक इसे करूँ॥

न हो किसी को पीड़ा मुझसे, ऐसा जीवन बीते,

मानव तन पाया है जो, सत्कर्मों में ही रीते।

ना प्रसिद्धि की चाह रहे, ना ईर्ष्या मन में धरूँ

सत्य-अहिंसा के पथ पर मानव धर्म मैं करूँ॥

दीन-दुखियों का साथ बनूँ, अँधियारे में दीप जलाऊँ,

हर चेहरे पर हँसी खिले, सबको गले लगाऊँ।

ना द्वेष, न शत्रुता मन में, बस प्रेम सदा भरूँ

सत्य-अहिंसा के पथ पर मानव धर्म मैं करूँ॥

तन-मन से समर्पित रहूँ, गाऊँ तेरा ही नाम,

भक्ति-दीप से जग आलोकित, पावन हो हर धाम।

सँवार लूँ इस जीवन को, भव-बन्धन सब हरूँ

हे प्रभु! मुझसे कुछ ऐसा कराएँ, जग हित मैं कर्म करूँ॥

लोभ-मोह के बन्धन छूटें, मन निर्मल हो जाए,

हर जन में तेरी छवि देखूँ, अंतर आलोकित पाए।

सत्य-अहिंसा धर्म बने, जीवन तेरा संदेश धरूँ

सत्य-अहिंसा के पथ पर मानव धर्म मैं करूँ॥

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