एक पत्नी की वेदना

हे प्रियतम !

तुम मेरे जीवन में आये

बहारों की बगिया बनकर

मैने संजोये सुन्दर सपने

तुमसा जीवन साथी पाकर ।

खायी क़समें साथ साथ

जीवन पथ पर चलने की

हृदय में रच बस गये आप

धन्य हुई मैं तुमको पाकर ।

ख़ुशियों के मेरे किवाड़ खुले

जीवन बगिया खूब महक गयी

कूद रही थी चहक रही थी

अपने पति के घर आकर ।

नियति को नही था मंज़ूर

मेरी ख़ुशियों पर लगा ग्रहण

तहस नहस हुई बसी गृहस्थी

एक नये प्यार के ख़ातिर ।

रोती रही मैं बिलखती रही

अनुनय विनय खूब करती रही

बहते अश्रुओं पर न दया आई

इतने क्रूर हुआ मेरे प्रियवर ।

आखिर तुमने क्यों छल किया

मेरा था तो नहीं कोई क़सूर

नयी दुनिया यदि बसाना था

क्यों लाये मुझको विवाह कर ।

तुमने मेरा परित्याग किया

पति धर्म से तुम विमुख हुये

पाप की भागी ठहरी मैं नही

तुम्हीं दोगे ऊपर इसका उत्तर ।

मैं तो हुई न पति के घर की

न बाबुल के आँगन की परी

फँस गयी नाव भंवर में अब

जीवन हो गया है बदतर ।

धिक्कार है ऐसे पुरुषत्व को

जो छल करते अबला नारी से

जब नहीं चाहत थी मैं तेरी

क्यों आये तुम शौहर बनकर ।

खूब छली गयी खूब ठगी गयी

अपने ही तो जीवन साथी से

विश्वास अब जग में रहा नही

हर पुरुष दिखता है कायर ।

नहीं दे सकती कोई श्राप

इतना तो मैं रही कृतघ्न नही

पर शुभकामना भी नहीं रही

समय ही देगा इसका उत्तर ।

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