सोच रहा हूँ
अगर गया तो क्या छोड़ूँगा
अपने पीछे
कुछ लिखी कवितायें
जिसका कोई मोल न होगा
इस तंग दिल दुनिया में
दो एक दोस्त जिस पर
भरोसा है कुछ बना हुआ
वह भी कितना साथ निभायेंगे
कुछ पता नहीं
भागम भाग रहा जीवन
हिसाब किताब की बही में
ऐसा कुछ भी नहीं
जो प्रिये तुम्हारी मुसीबतों
में हम कदम हो..
क्या छोड़ पाऊँगा
सिवाय उन शब्दों के
जो बिखरे हैं इधर उधर,
उन्हें भी तो संकलित न कर पाया,
हाँ ताक़त भर चलना चाहता हूँ
छोड़ना अकेले नहीं चाहता तुम्हें
कुछ भी तो मैं न कर पाया
जिसके बल पर पहाड़ सा जीवन
काटा जा सके ।