एक और क्रांति बाकी है

कहने को आज़ाद हैं हम पर बंधन अब भी बाकी हैं,

हर ओर चमकता स्वार्थ यहाँ एक और क्रांति बाकी है

नेता बदल गए वेश यहाँ पर सोच वही पुरानी है,

जनसेवा के नाम तले बस सत्ता की कहानी है।

विकास के वादे मंचों पर बस शब्दों में जगमगाते हैं,

पर गाँव की टूटी गलियों में बच्चे अब भी भटक जाते हैं।

हाँ बच्चे अब भी भटक जाते हैं

अधिकारों की बातें बहुत पर न्याय कहाँ पर मिलता है?

कानून वही झुकता दिखता जहाँ धन का पलड़ा झिलता है

अफसर की कलम जब रुकती है तो रिश्वत से चलती है,

सच्चाई आज की चौखट पर आँखें मूँद के पलती है।

जनता को भी सोचना होगा बस दोष कहाँ तक देंगे हम?

जब वोट बिके दो सिक्कों में तो फिर देश कैसे होंगे हम?

अब शब्द नहीं, कर्म चाहिए आत्मा से बलिदान चाहिए,

हर घर में सत्य की ज्वाला हर मन में ईमान चाहिए।

उठ भारत! फिर से जाग उठ तू अब भी सोया मत रह,

तेरे भीतर अग्नि छिपी है उसे पहचान, उसे कह।

भ्रष्टाचार के इस अंधेरे में सत्य की मशाल जलानी है,

हर बच्चे के होंठों पर कहना भारत माँ की लाज निभानी है

कहने को आज़ाद हैं हम पर बंधन अब भी बाकी हैं,

हर ओर चमकता स्वार्थ यहाँएक और क्रांति बाकी है

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