दो अंजाने एक दिन मिलते
प्रणय सूत्र में बंधते हैं ,
आपस में अजनबी हैं दोनों
दाम्पत्य पथ पर चलते हैं ।
एक राह के पथिक हैं दोनो
साथ साथ वे चलते हैं,
एक दूजे के मन की भाषा
बिना कहे ही समझते हैं ।
संग संग रहकर बातें करके
राह सुखद हो जाती है,
इक दूज के बिना उन्हें
अब पल वर्षों से लगते हैं ।
एक दूजे पर मिटने को
दोनों आतुर रहते हैं,
गुँथ जाता है प्रेम का धागा
प्रेम डोर जब बंधते हैं ।
सारा जीवन सुखद बिताते
नव सृजन वे करते हैं,
कर्म पथ पर आगे बढ़ते
फूलों से वे खिलते है ।
अटूट प्रेम उनका है इतना
कितना प्यारा नाता है,
मान और मनुहार में अब
वो बच्चों जैसे झगड़ते हैं ।