दीपक जला रे, जला रे जला रे
ज्ञान की ज्योति जला रे जला रे ।
कोई अछूता नहीं है इस जग में
सभी संसार के भ्रमजाल में फँसे हैं,
आकंठ तक डूबे स्वार्थ में हैं
दीपक जला रे, तमस दूर करे रे ।
भटकता मानव कस्तूरी मृग की तरह है
ध्यान और भक्ति से मिले प्रभु का परचम,
प्रेम और करुणा का प्रकाश फैला रे
मन-मस्तिष्क में सत्य का दीप जला रे ।
शांति और श्रृद्धा खोजें सदा तू
संसार के मोह-माया से हृदय को बचा रे,
दीपक जला रे, तमस दूर करे रे,
दीपक जला रे, अंधकार हर ओर झड़े रे।