धरती की चेतावनी

धरती की चेतावनी

धरती हिल रही है,

पर हम बेख़ौफ़ हैं,

व्यंग कर रहे “ये होता है!”

पूँछते “कितने रिक्टर की तीव्रता थी?”

छः से नीचे थी?

अच्छा, तो बात नहीं,

ये घातक नहीं!

चुप हो जाते हैं,

सोचते “ये होता रहता है”

नहीं समझना चाहते

ये एक चेतावनी है प्रकृति की ओर से!

हे मूर्ख मानव!

संभल जा

ज्यादा अत्याचार मत कर!!

पर मानव तो महा ज्ञानी,

बड़े-बड़े आविष्कार कर चुका है,

हर चीज़ की तोड़ है, तो क्यों डरे??

विनाशक हथियार बना रहे,

दूसरों को रोक रहे:

“अब आगे से मत बनाना,

बहुत ही विनाशक है”

पर जनाब! जो आप बनाये रखे हैं,

क्या वे फुलझड़ियाँ हैं??

शुरुआत अपने से करें,

नष्ट करें पहले आप

अपने ही विनाशकारी हथियार।

आप प्रकृति से ऊपर नहीं हैं;

वो जब अपना हथियार चलाएगा

तो आपका हथियार खिलौना हो जाएगा!

भूल गये कोरोना काल??

त्राहि-त्राहि मची थी!

कहाँ गये थे आपके वैज्ञानिक?

कहाँ गये भविष्यवक्ता?

वे भी कालकवलित हो गये,

प्रश्नचिह्न छोड़ गये।

लाश पर लाश उठी,

अपने भी पराये हो गये,

अर्थी उठाने वाला भी कोई नहीं

कोई देश नहीं बचा, कोई धरती नहीं बची,

जहाँ पर लाशें नहीं थीं

केवल एक वायरस था!

एक भृकुटी ही मेरी काफी है,

शून्य कर दूँगा, हे मानव!

तेरा अस्तित्व??

हाँ मैं ब्रह्म हूँ,

सृजन करता हूँ, पालन करता हूँ

और संहार भी करता हूँ!

मैं ब्रह्म हूँ!

मैं ब्रह्म हूँ!!

मैं ब्रह्म हूँ!!!

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