बूढ़ा बरगद

मैं एक बूढ़ा बरगद हूँ, देखो मेरी शाखाएँ,मेरे पत्ते हैं मेरे प्राण, मेरी जड़ें ही हैं मेरा आधार । बूढ़ा हूँ पर खुश हूँ, हरियाली में खो जाता,धरती से जड़ें चूमतीं, मन मेरा मुस्काता।अब बूढ़ा हूँ, विराम चाहिए,नये बरगद के लिए जगह बनाऊँ।जाऊँगा मैं, फिर आऊँगा,छोटा सा नया वृक्ष बनकर।नये पत्तों, नयी जड़ों के संग,फिर … Read more

ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ

कहाँ कहाँ खोजूँ मैं उसको, किसके दरवाज़े पे जाऊँ,जो मेरे चावल खा जाए, ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ। जीवन की कठिन राहों में, दोस्त हज़ारों मिलते हैं,मतलब पूरा होने पर ही,रास्ते अपने बदल लेते हैंहरदम साथ निभाने वाला, साथी ढूँढ कहाँ से लाऊँ?जो मेरे चावल खा जाए,ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ। हार पक्की मालूम थी … Read more

पटल की महफ़िल व्यंग्य पूर्ण गीत

पटल-पटल घूमे कविवर, घर का भूला हाल । शब्दों में जीते सपनों का, खाली पड़ा थाल ॥ मोबाइल बजा, पत्नी ने कहा,छोड़ो अपना पटल । राशन नहीं है घर में, भूखे पेट बच्चे रहे मचल ॥ संगीत बजाओ, सुर उठाओ, व्यंग्य में डूबे जीवन । भूल जाओ घर द्वार अब कविता में ही तुम काटो … Read more

हे मेरे सुंदर वन

हे मेरे सुंदर वन,नीरव निर्जन वन,मोह रहा है मनहे मेरे सुंदर वन ॥चहके पंछी गगन में,भ्रमर गाए मधुबन में,मेंढक की मीठी तान,सर्पों की छुपी पहचानसब मिल रचते संगीत वन ॥तेरे हृदय में अनगिन प्राणी,पाते सुख की शरण कहानी,मुझको भी देता शांति अनूप,तेरा हर रंग, हर रूप मेरे वन ॥लकड़ी के पुल पर खड़ा मैं यहाँ,निहार … Read more

माँ सीता का विरह गीत

बोलो जय सियाराम, जय जय सियाराम,जहाँ सीता वहाँ राम, जहाँ सीता वहाँ राम।सीता बिन शून्य राम, बोलो जय सियाराम॥बोले राम हे सौमित्र, मन का भार न सहूँ,राजधर्म का बंधन भारी, किन्तु वचन न कहूँ।जनकसुता पर लगा कलंक, जग ने उठाई बात,राम का हृदय रोता भीतर, विवश बना विधात॥जिस सीते के लिए किया रावण का संहार,जिस … Read more

हिचकियाँ

कहाँ से आती हो तुम, हिचकियाँ?ज़रा बता तो सहीतुम कौन हो?सुना है तुम संकेत देती हो,किसी के दिल की पुकार लाती हो।कहते हैं कोई मुझे याद करता है,मेरे लिए मन ही मन फ़रियाद करता है।तो फिर तुम तो मेरी मित्र हुई,मेरी शुभचिंतक हुई।जाकर कह दो उस अनजाने कोमैं भी उसे उतना ही प्यार करता हूँ।जब … Read more

सत्य की खोज में सिद्धार्थ से बुद्ध तक

संसार तो एक दृश्य-जगत हैदेखने में अनुपम, आकर्षक, मोहक।यह चंचल मन उसी में उलझा रहता है।पर प्रश्न उठता हैयदि यह संसार इतना मनोहर है,तो राजकुमार सिद्धार्थराजसुख छोड़ वन क्यों चले गए?क्योंकि उन्होंने केवल राजमहल का वैभव देखा था,उसके भीतर छिपे दुखों का सत्य नहीं।यौवन देखा था, पर वृद्धावस्था नहीं;चार कंधों पर उठी अर्थी देखी,तो जीवन … Read more

छोटे चूज़े

अंडे से निकला मैं प्यारा,मम्मी-पापा संग रहा संवारा।पंख उगे, पहली उड़ान भरी,आसमान में खुशियाँ भरी।साथी मिला, घोंसला सजाया,पाँच प्यारे चूज़े लाया।अब मैं स्वतंत्र, उड़ता नदियों में,सुख और शांति खोजूँ गीतों में।

वर्षा में प्रकृति और मिलन

वर्षा आई, मेघा छाए, मौसम हुआ ख़ुशनुमा,पोखर से निकले दादुर जी, सर्पों का सुंदर आहार हुआ।इक दूजे के बनने आहार, कीड़े-मकोड़े बाहर निकले,सबने मिलकर खानपान किया, हँसी-खुशी साथ चले बरसात की बूँदों में नाचे, पत्तों पर संगीत की छाया,धरती पर हर जीव मिला, समाजवाद का रंग लाया।कीड़े, मकोड़े, सर्प और दादुर, सबने बाँटी खुशी अपनी,बरसात … Read more

बरसात की छांव में मिलन गीत

तूफ़ान भी कभी कोमल लगे, जब हाथों में हाथ हो,बरसात की हर बूँद में, मन का दीपक साथ हो।घुँघराती हवाएँ गाएँ, पत्तों पर नाचते गीत,तुम्हारी हँसी की चमक से, खिल उठे हर फूल-सी प्रीतछतरी भी अब फिज़ा में, रंगों की तरह बिखरी,तुमसे जुड़ी हर साँस में, मीठी बातें छिपी।चाय की प्याली में तारे, बरसात की … Read more