मैं एक बूढ़ा बरगद हूँ, देखो मेरी शाखाएँ,
मेरे पत्ते हैं मेरे प्राण, मेरी जड़ें ही हैं मेरा आधार ।
बूढ़ा हूँ पर खुश हूँ, हरियाली में खो जाता,
धरती से जड़ें चूमतीं, मन मेरा मुस्काता।
अब बूढ़ा हूँ, विराम चाहिए,
नये बरगद के लिए जगह बनाऊँ।
जाऊँगा मैं, फिर आऊँगा,
छोटा सा नया वृक्ष बनकर।
नये पत्तों, नयी जड़ों के संग,
फिर से बसाऊँगा मैं नया परिवार
जीवन का यही क्रम है,
आऊँगा मैं बारम्बार ॥