“भिक्षुक”
नाम सुनते ही अटपटा लगता है,
दिखने में साधारण, पर अर्थ गूढ़।
जिसने इस शब्द को भलीभाँति समझ लिया,
उसने परमात्म तत्त्व को जान लिया।
इस मिथ्या संसार में
हम सभी भिक्षुक ही तो हैं।
बिना भिक्षुक बने कोई ज्ञानी नहीं होता,
ज्ञानी हुए बिना कोई संन्यासी नहीं होता,
और बिना वैराग्य के
आत्मबोध कहाँ होता है?
यह संसार क्या है?
ख़ाली पानी के बबूले,
आकाश में लहराता इन्द्रधनुष
केवल दृष्टि के लिए मनोरम।
भिक्षा तो अमीर-गरीब दोनों माँगते हैं।
भक्त मन्दिर में जाकर
भगवान से भिक्षा माँगता है
“हे प्रभु! मेरी मनोकामना पूर्ण कर दो,
मैं लड्डू चढ़ाऊँगा, सोने का छत्र चढ़ाऊँगा।”
जिसकी जैसी हैसियत,
उसका वैसा चढ़ावा।
भगवान से जैसे एक सौदा
“इस हाथ दे, उस हाथ ले।”
और कोई मंदिर के बाहर बैठा
क्षुधा पूर्ति हेतु भिक्षा माँगता है।
भिक्षुक तो आखिरकार दोनों हुए न!
तो क्या संसार सुख का त्याग कर
हम भाग जाएँ?
नहीं यह आवश्यक नहीं।
इसी संसार में जिएँ,
जीवन का भरपूर स्वाद लें।
पर जब स्वाद खट्टा लगने लगे,
मीठा भी हानिकारक लगे,
और मन स्वयं कहे
“अब कुछ अच्छा नहीं लगता,”
तब न वासना रहती है, न स्वाद,
न वाद, न विवाद।
केवल एक सात्त्विक विचार बचता है
बढ़ चलें बुद्धत्व की ओर।
यही एक सत्य मार्ग है।
बुद्धं शरणं गच्छामि।