भाव गीत कोयलिया

कोयलिया! तू कितनी प्यारी,तेरी बोली मधुर सुहानी,

तेरे सुर में जादू बसता, हर डाली पे तेरा गाना!

रंग तेरा भले काला हो, बोली तेरी मतवाली है

तेरी तान सुनकर कोयलिया,प्रकृति भी मुस्कराती है

पर जब तेरी कथा सुनी मैं, मन भीतर कुछ टूटा है,

तू अपने अंडे नहीं सेती, कौओं के घर छोड़ा है।

कहाँ गया तेरा मातृत्व,कहाँ तेरी संवेदना है?

तेरी वाणी मधुर जरूर,पर अंतर में वेदना है

कोयलिया! तू कितनी प्यारी,तेरी बोली मधुर सुहानी,

तेरे सुर में जादू बसता, हर डाली पे तेरा गाना!

कोयलिया,तू दर्पण इस युग का,जहाँ मीठे बोल बिकते हैं

होंठों पर शहद टपकता है, मन में विष के सर्प रेंगते हैं,

मधुर वचन की आड़ में अब,कितने स्वार्थ छिपे रहते हैं

चेहरे मुस्कानें बाँटते हैं,दिल भीतर रोते रहते हैं।

ओ कोयलिया, सच कह दूँ मैं तू दोषी कम, मनुष्य बड़ा!

तेरी मिठास तो स्वाभाविक,मानव ने छल का रूप गढ़ा।

काली तू तन से भले हो, मन से फिर भी निर्मल है

पर मानव तन से उजला है, अंतर पूरा संबल है।

मधुरता जब हृदय से निकले,वह पूजा, वह साधना है;

पर स्वार्थ से जो जन्मे वाणी वो दिखावटी वंदना है।

कोयलिया! तू गीत सुहानी,तेरे सुर में जग की कहानी

रंग तेरा भले ही काला बोली तेरी अमर निशानी ।

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