बसंत

ऋतुओं की रानी मैं बसंत हूँ फूलों में हूँ मैं कलियों में

खेत खलिहानों में मैं दिखती,दिखती हूँ हर गलियों में ॥

कलियाँ कलियाँ हैं मुस्काई

सुगंधित फूल खिले बन उपवन

कुसुमित किंसुक के फल सुन्दर

प्रकृति प्रमुदित प्रफुल्लित मन ।

पक्षी गाते गीत मनोहर कलरव करते हैं मस्ती में

बसंत की नयी ऊर्जा दिखती है आज सबके मन में ॥

पीली सरसों फूली हुई है

खेत खेत खूब हर्षाई,

प्रकृति प्रमुदित मन हँसती

आई आई बसंत पंचमी आई ।

अमराई आम्र वृक्ष की डाली कूज रही कोयल छिपी पत्तों में

प्रकृति ने रंगीन चादर ओढ़ी, बसंत बहार छाई हर दिल में ॥

एक नई आशा है, नयी ऊर्जा है,

जीवन को नई दिशा देती,

दिव्य दिवस ये आया है

माँ सरस्वती के श्री चरणों में करते वंदन ।

हे स्वर साधना की देवी !! नित ध्यान धरूँ मैं चरणों में ।

कृपा अपनी बनाये रखना, बसो तुम मेरे मन मन्दिर में ॥

ऋतुओं की रानी मैं बसंत हूँ फूलों में हूँ मैं कलियों में

खेत खलिहानों में मैं दिखती, दिखती हूँ हर गलियों में ॥

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