पहले बच्चों का पालन-पोषण
संवेदना और सादगी का संगम था
जहाँ ज़रूरतें सीमित थीं,
पर अपनापन असीम।
आज का पालन-पोषण
सुविधाओं की सूची बन गया है।
बच्चा पैदा होते ही बीमा चाहिए,
महँगे खिलौनों से भरा कमरा चाहिए,
ए.सी. वाला नर्सरी रूम,
हर त्योहार पर नया परिधान,
और स्कूल की फ़ीस
लाखों में मापी जाती है।
अब बचपन भी ब्रांडेड हो गया है।
हमारे समय में तो
एक गुड़िया, एक बल्ला,
या बस एक साइकिल
पूरे मोहल्ले के बच्चों की होती थी।
खेल में न कोई झगड़ा,
न कोई ‘मेरा–तेरा’।
सब कुछ साझा
खिलौने भी, कपड़े भी,
और खुशियाँ भी।
एक-दो कपड़े ही होते,
त्योहार पर माँ के हाथ से सिले,
धुले-धुले रखे जाते गर्व से
जैसे कोई खज़ाना हों।
अब तो अलमारी भरी रहती है
पर मन खाली लगता है।
कपड़े अब फटते नहीं,
उनसे पहले “नया ट्रेंड” आ जाता है।
पसंद न आए तो फेंक दो!
और हम सोचते रह जाते हैं
कब से चीज़ें इतनी सस्ती,
और रिश्ते इतने महँगे हो गए?
पहले बच्चे “संस्कार” में पलते थे,
अब “ब्रांड” में पनपते हैं।
पहले माँ की कहानी,
दादी की लोरी
नींद लाती थी;
अब टैबलेट की स्क्रीन
आँखों को जगाए रखती है।
पहले स्कूल में “शिक्षक” मिलते थे,
अब “ट्रेनर” मिलते हैं;
पहले माता-पिता “पालक” थे,
अब “स्पॉन्सर” बन गए हैं।
क्या यही प्रगति है?
या संवेदनाओं का सौदा?
ज़रूरत है
कि हम फिर लौटें
उस सहजता की ओर,
जहाँ बच्चे वस्तुओं से नहीं,
मनुष्यता से समृद्ध होते थे।
जहाँ माँ के हाथ की रोटी
फास्ट फूड से स्वादिष्ट थी,
जहाँ पिता की डाँट में भी
संस्कार छिपा था,
और जहाँ बचपन
बस बचपन था
प्रतियोगिता नहीं।
हे ईश्वर,
दे हर माता-पिता को वह बुद्धि,
कि वे अपने बच्चों को
सुविधा नहीं
संस्कार दें।