बीते समय की हुई अब कहानी
बड़ी ख़ूबसूरत थी वह जिन्दगानी ।
कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
जूते न चप्पल चुपके से खिसकना
रास्ते में उड़ती तितलियों को पकड़ना
फड़फड़ाती उन्हें देख हवा में उड़ाना
काग़ज़ की नैया उसे पानी पर तैराना
चींटों को शरारत से उस पर बैठाना
बड़ी ख़ूबसूरत थी वह ज़िन्दगानी ।
कभी रेत के ऊंचे टीले पर जाना
घरौंदा बनाना उसे फिर मिटाना
झूलों से गिरना गिर कर संभलना
लगी चोट तो घर पर न बताना
आजी की मोहक चटपटी कहानी
सुनाती जो देर रात अपनी ज़ुबानी
बड़ी ख़ूबसूरत थी वह जिन्दगानी ।
छुट्टियों में मामा के घर जा टपकना
शरारत भरी हरकतें खूब करना
मासूमियत मेरे चेहरे से थी टपकती
सभी कहते थे जरा दे दो मुझे पप्पी
दुनिया का ग़म न रिश्तों का बंधन
बीते समय की हुई सब कहानी
बड़ी ख़ूबसूरत थी वह जिन्दगानी ।
बचपन का ज़माना न चिंता न फँसाना
न खाने की चिंता न भूख लगती
बस यादों का मेला और खेलते रह जाना
मुंशी जी की छड़ी खुद तोड़ कर लेना
न पाठ याद होता तो खुद पिट जाना
पिटाई की बातें घर पर न बताना
बड़ी ख़ूबसूरत थी बचपन की जिन्दगानी ।