डम-डम डमरू गूँज उठा जब, काँपा काल-कपाल।
भस्म-विभूषित देह महेश की, दहके दिग-दिग ज्वाल॥
चिता-राख की उड़ती होरी, नभ पर रचे वितान।
जग की झूठी शान जला कर, हँसे श्मशान-भवान॥
त्रिपुंड अंकित भाल प्रखर, दृग में विद्युत-रेखा।
एक दृष्टि में भस्म करैं, माया-जाल सहेजा॥
मृग चर्म, व्याघ्रचर्म लहरत, डोले डमरू-ताल।
प्रलय-नर्तन कर औघड़ बोलेसब जग माटी लाल!”॥
जहाँ बुझी हर आस मनुज की, वहीं जले विश्वास।
मृत्यु-द्वार पर खड़ा विरागी, खोले जीवन-त्रास॥
गिरिजा संग औघड़ हँसते, रंगे भस्म-अनूप।
शक्ति-शिव का ये मिलन देख, झुक जाए विश्वरूप ॥
भूत-प्रेत, पिशाच, गण सब, गावत फाग अनोखा।
जिसने देखा तांडव-रंग, मिटा भय का रोषा॥
न कंचन का मोह यहाँ है, न मणि-मुक्ता हार।
एक चुटकी राख सिखावेक्षणभंगुर संसार!”॥
भस्म-अंग, जटा-जूट में, दहके दिव्य कराल।
जिसने शरण महेश की ली, तजि भय भयो निहाल॥
डम-डम पुनि नभ में गुंजा, “हर हर” गगन अपार।
औघड़ फाग सुनत ही जागे, अंतर का हुंकार॥
श्मशान-होरी कहे पुकारेत्यागो झूठा मान।
भोले रंग जो भी रंगायो, सो पावे निर्वाण॥
उमानाथ कहि छोड़ चिंता, मेटत शिव हर जंजाल।
काल खड़ा दूरै काँपता, देख रूप महाकाल॥