देखता हूँ जब सामने, पाता हूँ अपनों को खड़ा।
कैसे कहूँ तुम मेरे शत्रु हो, मन दुविधा में पड़ा।
अपने ही हैं सब सुहृद, अपने ही तो सब रक्त हैं।
कैसे कहूँ तुम मेरे शत्रु हो, मन दुविधा में पड़ा।
सारी त्वचा मेरी जल रही, मन मेरा भ्रमित हो चला।
शिथिल हो गये सब अंग, किंकर्तव्यविमूढ़ मैं खड़ा।
न विजय की कामना मुझे, न भोग जीवन से राग है।
हाँ, कुछ खोने का डर है मुझे, पार्थ सा दिग्भ्रमित मैं खड़ा।
त्याग रहा हूँ अपना भाग, बंधु ये सुख तुम ही भोगो।
हाँ, मिलेंगे जरूर किसी मोड़ पर, जब न्यायाधीश धर्मराज खड़ा।
देखता हूँ जब सामने, पाता हूँ अपनों को खड़ा।
कैसे कहूँ तुम मेरे शत्रु हो, मन दुविधा में पड़ा।