जोत रहा था वह खेतों को,
धरती से सोना पाने को।
गर्मी में तपता वह,
परिवार की भूख मिटाने को।
आधे तन पर कपड़ा, फटा पुराना,
केवल इज्जत बचाने को।
दो जून की रोटी पाने का ठिकाना नहीं,
जो विधना उपलब्ध, उसी में भूख मिटाने को।
कर्ज के बोझ तले पिसता,
सूद पर सूद चढ़ता जाता।
उगाही दूत जब घर में आता,
चुपके से खिसक जाता।
गरीब की यही कहानी,
अभावों भरा जीवन होता।
हर कदम पर संघर्ष खड़ा,
संघर्षों में ही जीता वह।
आसमान की ओर तकता रहता,
कब मेघ आएँ, बरसेंगे।
इन्द्र देव की विधिवत पूजा करता,
कैसे प्रसन्न होंगे वे?
कभी अनावृष्टि, कभी ओले गिरते,
दिल पर जैसे गोले।
खड़ी फसल बर्बाद,
मुँह छिपा रोता वह।
हे अन्नदाता! तेरी करुण कहानी,
कैसे मैं वर्णन करूँ?
आप ही से हम जीवित हैं,
नहीं तो अन्न कौन देगा?
जोत रहा था वह खेतों को,
धरती से सोना पाने को।
गर्मी में तपता वह,
परिवार की भूख मिटाने को।