ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँ
ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँ
थक कर जब मैं रुक सा जाऊँ,
राहें भी अनजानी लगें,
बिना कहे जो हाथ बढ़ाए,
दौड़ के मुझसे आ गले लगें।
हर ख़ामोशी पढ़ ले मेरी,
हर डर को जो समझ जाए,
ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँ
कृष्ण–सुदामा जैसी डोरी,
आज कहाँ वो रीत निभाए,
सादा दिल, सच्चा रिश्ता,
जो हर हाल में साथ निभाए।
नाम नहीं, बस भाव निभाए,
सुख-दुख में जो संग रह जाए,
ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँ
सुख की महफ़िल सजते ही सब,
अपने-अपने रंग दिखाएँ,
दुख की आँधी आते ही क्यों,
अपने भी पराए हो जाएँ।
जो आँसू को बोझ न माने,
जो तकलीफ़ को अपना कह जाए,
मेरी हार में मेरी ढाल बने,
मेरी जीत में झुक जाए।
ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँ
ना दौलत चाहूँ, ना शोहरत,
बस इतना सा अरमान
कोई तो हो जो कह दे मुझसे,
“तू अकेला नहीं इंसान”
ऐसा मित्र अगर मिल जाए,
तो हर टूटन जुड़ सी जाए,
जो मेरे मन में घर कर ले,
दिल की हर गाँठ खोल जाए।
ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँ
ऐसा दोस्त कहाँ से लाऊँ