ऐ ज़िंदगी

ऐ मेरी ज़िंदगी !!

क्या लिखूँ तुझ पर

तू तो एक किताब है

पढ़ सका है न कोई

तेरा न कोई हिसाब है ।

कभी रुलाती कभी हंसाती

क्या क्या तू नही करती है

चलती फिरती ज़िन्दगी को

दांव पर लगा तू देती है

एक डगर पर कभी न चलती

डगर बदलती रहती है

आड़े तिरछे पग तेरे पड़ते

अपनी धुन में चलती है ।

चलना ही तेरी नियति है

कभी धूप में कभी छांव में

पल भर भी वि़श्राम न करती

बिना रुके तू बढ़ती जाती

लौटकर वापस न आती

समझ सका नहीं है कोई

तेरे मन की भाषा को

तू जैसी भी है ..

है तो मेरी ज़िंदगी

पर मेरे हिसाब से भला

क्यों तू नहीं चलती है ।

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