अधूरी कविता

मेरी वह अधूरी कविता

कहाँ तू गयी

लिखना चाहता हूँ अगली पंक्ति

पिछली छुप गयी ।

आधी अधूरी पड़ी हुई थी

नाराज़ हो गयी

मान रहा हूँ अपनी गलती

बड़ी भूल हो गयी ।

शब्द नही थे मेरे पास

तू अपूर्ण रह गयी

मत कोसना मुझको तू

लेखनी मेरी है नयी ।

जोड़ घटाकर पूरा करता

बात पसंद नहीं आयी

संतुष्टि कैसे मुझे मिलती

यदि मुझे ही नही भायी ।

पूर्णता होती सबकी चाहत

तू फीकी रह गयी

भव्य कलेवर तुझको दूँगा

अब तू चमकेगी नयी ।

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