कहाँ गया वो मिलना जुलना
कहाँ गयी सब जान पहचान
सुख दुख में भी खड़े न होते
कितना बदल गया रे इंसान ।
कहाँ गया पैतृक घर अपना
कहाँ गये मेरे बूढ़े दादा दादी
संयुक्त परिवार बिखर गये
घर दिखता है जैसे श्मशान ।
बाबा को सारा गाँव जानता
पिता को सब मोहल्ले वाले
पुत्र को नही जानता पड़ोसी
आज की पीढ़ी की पहचान ।
टूटने के क्रम में टूट चुका है
न जाने आगे कितना टूटेगा
घर में रहते मात्र तीन जन हैं
तीनों के हैं पर पृथक स्थान ।