आये थे हरि भजन को,
घोटन लगे कपास।
विषयों में इतना रम गये,
भव में बिखरा सुवास।
ऊं हरि हरि हरि हरि
मन ने कहा, छोड़ो तनिक,
जन्म-मरण की बात।
जीवन तुझको जो मिला,
पहले उसको भोगो तात।
ऊं हरि हरि हरि हरि
भूल गया यम दंड-प्रहार,
नहीं रहा कोई त्रास।
जीवन की डोर कहीं और है,
दीर्घायु पाने की आस।
ऊं हरि हरि हरि हरि
चल पड़े मन के पथ पर,
प्रेम ही बना संगीत।
सुख-दुःख की सभी डोरें,
हो गईं जैसे गीत।
ऊं हरि हरि हरि हरि
आओ भजें हरि नाम को,
भव भ्रम से उबारो।
जीवन तेरा धन्य होगा,
केवल प्रभु ही सहारो।
ऊं हरि हरि हरि हरि
हरि की भक्ति में रम,
मन को मिले विश्राम।
सुख-दुःख सब होंगे दूर,
भव से मुक्त होगा ग्राम।
ऊं हरि हरि हरि हरि
जय हो हरि, जय हो हरि,
नाम ही तेरा करता उद्धार।
भव बंधन सब टूट जाए,
प्रभु को केवल पुकार।
ऊं हरि हरि हरि हरि