प्रभु तेरे चरणों में मन मेरा लागा
हर क्षण हर पल उमगत अनुरागा ॥
जिन चरणों के चरण रज पाकर
गौतम पत्नी अहिल्या तरी थी
पायी मुक्ति पति घोर शाप से
उन पद पंकज में मन मेरा लागा ॥
जहां राम मेरे धरती पर थे सोये
कुश पल्लव का बिछौना बिछाये
सिरहाने की तकिया हाथों की बनाये
उस धरा धूलि में मेरा मन अनुरागा॥
जिन जिन पथ को माँ शबरी निहारी
फूलों से सजाकर बाट थी जुहारी
आये थे प्रभु राम पावन कुटिया में
पथ को बुहारने में मन मेरा लागा ॥
जूठे बेर प्रभु ने माँ शबरी का खाया
प्रेम प्रधान होता जग को दिखलाया
नवधा भक्ति ज्ञान शबरी को दीन्हा
वह भक्ति भाव मन को प्रिय लागा ॥
धन्य संचित पुण्य प्रभाव केवट का
स्व हस्त प्रभु चरण प्रक्षालन कीन्हा
परिवार सहित चरणोदक था पाया
उस पावन चरणामृत में मन लागा ॥
राम खड़ाऊँ को भाई भरत ने पूजा
नहीं दिखता कोई ऐसा भ्राता दूजा
धन्य पवित्र भातृ प्रेम है भरत का
उसी राम खड़ाऊँ में मन मेरा लागा ॥
जिन चरणों को लक्ष्मण ने था चापा
सुरक्षा प्रहरी बन कठिन व्रत कीन्हा
रहे लखन राम चरन पद अनुरागी
वही चरण प्रेम में मन मेरा लागा ॥
प्रभु तेरे चरणों में मन मेरा लागा
हर क्षण हर पल उमगत अनुरागा ।