फ़ाइनल दोहों की श्रृंखला

  1. फ़ाइनल किये गये दोहे - प्रकाशन हेतु

    (ये दोहे दिनेश जी ने चेक कर लिये हैं )

    1. माँ सरस्वती - दोहे की माला

    शब्द-शब्द है ब्रह्म जो, माँ वाणी की देन।

    मन-मंदिर में गढ़ लिखूँ, हो जाए मन-चैन॥

    वीणा नाद जहां बजे, झर-झर बरसे ज्ञान।

    जिस पर दे शुभ दृष्टि माँ, बनते वही सुजान॥

    माँ की वीणा दिव्य है, देती बुद्धि-विवेक।

    ज्ञान भण्डार वो भरे, करे बुद्धि को नेक ॥

    सत्-चित्-आनंद रूपिनी, वाणी की अभिराम।

    चरण-वंदना नित करूँ, मन को मिले विश्राम॥

    माँ की महिमा अमित है, मिटे मूढ़ता जाय।

    दास बने जब मात का, जग में यश फल पाय॥

    हिय की समझे जो यहां, ऐसी रहे उमंग।

    लिखूं सद्ग्रंथ आज मैं, फैले शुभता संग॥

    माँ चरणों में शीश धर, लेता नित वरदान।

    उमानाथ पर कृपा करें, शीतल हो मन प्रान॥

    1. प्रेम के रिश्ते

    प्रेम न चाहत माँगता, न चाहता अधिकार।

    मन की श्रद्धा भर मिले, बस इतना उपहार॥

    मन से मन जब जुड़ गया, मिटते रहे विकार।

    भाव प्रेम का बढ़ रहा, जैसे मधु में हार॥

    रिश्ते बोलें प्रेम से, टूटे मन के छोर।

    तीखे वचन न बोलते, करते केवल शोर ॥

    दिल में रिश्ते वो बसें , जिनमें पावन भाव।

    छल - कपट से यदि युक्त हैं, देते केवल घाव ॥

    घनिष्ठ मित्र वही सदा, दुख में आए काम।

    शुद्ध मन से गले मिले, न खोजे कभी खाम॥

    पाहुन अब आते नहीं, दूर-दूर सब भाग।

    आकांक्षा की भेंट में, नही रहा अनुराग ॥

    कुछ समय जो निकालिए, मिले सबसे जरूर ।

    यदि संवाद विच्छेद हुआ, हो जायेंगे दूर ॥

    1. क्रोध और पश्चाताप

    जब पछताते क्रोध पे, करो क्रोध को बैन।

    मिले शान्ति तुमको तभी, दिल को भावे चैन॥

    करें क्रोध पछतात हैं , मन को मिले न चैन।

    बढ़ते शोक हज़ार हैं , मन होता बेचैन ॥

    पछतावें की धूप से, पिघले मन का भाव।

    कलुष बहे धारा बने, निर्मल नूतन चाव॥

    पछतावें की अग्नि में, जलते दिन या रात।

    मन के मैल मिटाय के, हो जावें निर्मल भ्रात॥

    बात-बात पर क्यों लड़े, क्यों करता है क्रोध।

    मनमाफ़िक किसको मिला, कर मन में यह बोध॥

    बिन समझे जो बोलते, कहलाये न महान ।

    झूठी शान बघारते, मिले नही पहचान ॥

    अहंकार की आग में, जलता रहता प्राण।

    पल पल ही वो घूंटता, नहीं होत कल्याण ॥

    1. राम परमधाम गमन

    मिला संकेत राम को, साधे तब वह धाम।

    पर हनुमत की प्रीति से, द्रवित हुए श्रीराम॥

    यम भी आने से डरे, अवधपुरी का मान ।

    रघुवर के द्वारे डटे, राम भक्त हनुमान ॥

    गिरा अँगूठी राम ने, खोला छिद्र का मार्ग।

    भक्ति परीक्षा थी वही, हनुमत का अनुराग॥

    नाग लोक में पहुँचते, देखे ढेर अनूप।

    हर अंगूठी राम की, हुए चकित कपि रूप॥

    हर इक मुद्रिका दिख रही, इक जैसी आकार।

    सृष्टि-चक्र के रहस्य का, हुआ वहां साकार॥

    कल्प कल्प अवतार हो, राम कृपा के धाम।

    हर युग में होता रहा, पाप हेतु संग्राम ॥

    तभी हनुमान को हुआ, भाव गूढ़ प्रबोध।

    राम मिलेंगे फिर यहीं, हुआ भाव का बोध॥

    1. जिन्दगी की राह

    फूलों-सा जीवन रहे, बाँटे यहां सुगंध।

    काँटे के वह संग हो , त्यागे ना वह गंध॥

    हंसते हंसते ही कटे, जीवन की ये राह ।

    दुख भी आये सामने, थमे ना गति प्रवाह ॥

    ज़िन्दगी राह है बड़ी, बहुत बड़ा अभियान।

    कोशिश से ही सब मिले, मन में लो यह ठान॥

    पग–पग संकट मिलेंगे, रखना दृढ़ विश्वास।

    करम करत जो लोग हैं, देते जीवन–आस॥

    निज पौरुष से जो मिले, पाओ तुम तब खास।

    लोभ भला ना होत है, देत नही यह रास॥

    करमो को मत परखिए, अद्भुत इसका खेल।

    कब पलटी यह मार दे, चाहे चढ़े न बेल॥

    जीवन का पल फूल सा, टिका क्षणों के बीच।

    सद्कर्मों की पंखुड़ी, जीवन करती सींच ॥

    1. जीव हत्या

    छुरी गले पर चल रही, दर्द सहन ना होय।

    छटपटात जब जीव है, मानवता जात खोय॥

    नानवेज जो खा रहे, खाते लाश अधीर,

    नोच नोच वो खा रहे, खाते पाप गंभीर।।

    रुचि के खातिर कर रहे, कत्ल जीव का आज,

    अपने खातिर साचते , उसी योनि का साज‌।।

    स्वाद तृप्ति के नाम पर,मत कर जीव हलाल,

    वो भी तो जो होत है, किसी जीव का लाल।।

    जीव दया की भाव है, सही धर्म की राह ,

    रखो सोच यही यहां,मिले सही सब राह।।

    नानवेज जो खा रहे, समझ न तन की पीर ।

    कौर-कौर में तड़पते, पीड़ा होत अधीर ॥

    तड़पत जीव जब देखता , तड़प जात है दिल,

    हृदय व्यथा से रो रहा, कैसे लेते लील।।

    1. समय का महत्व

    समय सदा संभालिये, है सच्चा यह धाम।

    बीता पल ना लौटता, करता नहीं सलाम॥

    समय और इंसान का, करें मान-सम्मान।

    बीता पल फिर लौटकर, नहीं देत पहचान॥

    जग में कोई है नहीं, कहीं सुखी इंसान।

    हर मन में बस चल रहा, कोलाहल ही जान॥

    समय सदा बलवान है, रहत नहीं है साथ।

    चूर करे अभिमान को, पीछे पीटे माथ॥

    समय अगर अनुकूल है, सभी खड़े हैं साथ।

    समय अगर प्रतिकूल तो, दूर दिखाये हाथ ।

    अपनी गति से ही चले, समय लगाकर पंख ।

    नही बांध सकते इसे , क्या राजा क्या रंक ॥

    कल पे काज न टालिए, करिए उसको आज।

    कल तो देखा ही नहीं, कब करियेगा काज ॥

    1. शब्द और कविता

    शब्द स्वयं ही ब्रह्म हैं, देते दिव्य पुकार।

    नाद तरंगों से सजी, लीला भूतल-भार॥

    मन में गहराई रहे, निर्मल होत विचार।

    शब्दों की माला पिरो, बने गले का हार॥

    सार-सार को गह लिया, थोथा दिया उड़ाय।

    शब्द बने जब भाव से, कविता तब कहलाय ॥

    भाव बिना हर शब्द भी, जैसे सूखी रेत।

    रस पाकर ही काव्य में, बनत है अमृत-सेत ॥

    शब्द अगर हित में लिखो, शुद्ध रहे अवलेश।

    काल बदल जाए मगर, देत वही संदेश ॥

    नीति रहे आधार में, सत्य रहे उपदेश ।

    मानव हित की राह पर, आगे बढ़ संदेश ॥

    कलम जगे जब भक्तिमय, मन हो रामाधार ।

    शब्द बने फिर शब्द से, जग का करे उद्धार ॥

    1. स्वाभिमान और विनम्रता

    झुकना अच्छी बात है, देती इक पहचान।

    स्वाभिमान के मोल पे, होता नहीं सम्मान॥

    स्वाभिमान से दीपते, विनय बने श्रृंगार ।

    दोनों मिलकर गढ़ रहे, मानव का व्यवहार॥

    स्वाभिमान झुकता नही, करो न इस पर घात ।

    झुके बिना जो बढ़ सके, वही मनुज की बात॥

    सरल स्वभाव सुगंध-सा, होता यह संस्कार।

    निर्बल उसे न समझिए, जिसका हृदय उदार॥

    मिट जाती हैं दूरियाँ, रख वाणी पर मौन।

    भाव शीलता का रहें , सीख बताये कौन॥

    मन अरु दामन साफ़ हो, मन से मिलता मान।

    हृदय भरी यदि कुटिलता, कैसे मिले सम्मान॥

    शीतल से बढ़कर नहीं, कोई भूषण और।

    जिसे धरा मानव हृदय, सफल हुआ हर तौर ॥

    1. नैतिक दोहे

    जीवन जैसा है मिला, मान उसे परितोष ।

    खुशियों से ही जो बने, छोड़ शिकायत-रोष॥

    जितना जीवन पा लिया, उतना कर स्वीकार ।

    खुशियों से ही जो बने, छोड़ मलाल-विचार॥

    मोह लोभ का छोड़िए, चलिए राह सुकाम।

    निर्मल निश्छल आप हो, पाते आप मुकाम॥

    सत्य धरा की नींव है, झूठ भवन की रेत।

    धूप पड़े तो ढह पड़े, टिके न इक भी खेत॥

    झूठे सुख के मोह में, मन को मत दे फाँस।

    सत्य बसे जिस हृदय में, देता कभी न टांस ॥

    स्वार्थ भले ही दे ख़ुशी, टिके न उसकी जात।

    सत्य–धर्म के पंथ पर, मिलती सच्ची बात॥

    निज पौरुष जो कुछ मिले, पाओ तुम संतोष ।

    करो न लालच नीचता, हेतु घृणा अरु रोष ॥

    1. धर्म सेवा और परोपकार

    परहित करते चल यहां, करता चल उपकार।

    सुख बाँटोगे यदि जहाँ, हल्का होगा भार॥

    दान करे जो भाव से, गुप्त रूप से होय ।

    वही दान सार्थक लगे, पुण्य ही पुण्य होय ॥

    खुले हाथ से दान दे, छोड़ लोभ संकोच ।

    इक के बदले दो मिले, रख मन में यह सोच ॥

    लालच से मिलता नहीं, सुख - समृद्ध का द्वार ।

    दान-दया के बीज से, खिलता है संसार॥

    दान दीजिए दीन को, होता पुण्य महान।

    देकर भूलो देन को, गुप्त रहै उपदान॥

    मिलता बहुत सुकून है, कर लो परोपकार।

    सब धर्मों से श्रेष्ठ है, सेवा का संसार॥

    थोड़ा समय निकाल कर, कर ले कुछ उपकार ।

    जन्म सार्थक बन जाये, जीवन न हो बेकार ।

    1. भगवद् चिंतन

    ज्ञान बिना जग शून्यता, मन रहता लाचार।

    सत्संगति की रोशनी, खोलत हैं सब द्वार॥

    जितना साधे ध्यान को, उतना मिले विश्राम।

    मन मंदिर में गूँजता, हर पल प्रभु का नाम ॥

    अपने मन से बातकर, सुन अंतर की बात।

    मन-मंदिर में सत्य है, बाहर सब आघात॥

    अहं विकट दीवार है, कर दे भाव - विभाव।

    चलें विनम्र राह जो, मिलते प्रभु का ठाँव ॥

    सेवा का पथ श्रेष्ठ है, फल की इच्छा त्याग।

    दुख हर ले जो और का, पाए प्रभु अनुराग॥

    जप-ध्यान से हुआ, मन का सारा भार।

    प्रभु-स्मरण में लीन हो, मिलती परम-बहार॥

    विपदा आये लाख जब, टूटे मन का धीर ।

    प्रभु चरणों में प्रेम हो, हर ले संकट-पीर ॥

    मन की गूँगी वेदना, बोले बिन आवाज़।

    प्रभु तो अंतर्यामी हैं, समझें हर अरदास॥

    लाभ-लोभ से दूर रह, कर ले प्रभु विचार।

    मृदु-सी शीतल छाँव-सा, मिलता दिव्य आधार ॥

    धन आये और जाये, झूठा जग व्यापार।

    प्रभु भक्ति से जो जुड़ा, वही सुखी संसार॥

    भूल गया उद्देश्य तू, आया क्यों संसार।

    मोहजाल में फँस गया, बढ़ा लिया तू रार॥

    दुनिया इक रंगमंच है, निभा रहे किरदार।

    आते-जाते काल में, मिलते रुप हजार ॥

    नयनों में प्रभु-छवि बसें, हृदय करें हुंकार।

    संकट से भी पार हो, मिलत दिव्य आधार ॥

    लोभ-मोह का जाल जब, मन को दे झकझोर।

    नाम-स्मरण ही काटता, भवसागर की डोर ॥

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