चलत समय के संग रे प्राणी,
काहे करे अभिमान।
आया खाली, जाएगा खाली,
बीच का सब सामान॥
तन थक गया, साँसें गिनती,
मन अब भी माया चाहे,
पर भीतर से आवाज़ उठे
छोड़ दे पथ, जो बाँधे॥
न धन तेरा, न तन तेरा,
न संग तेरा कोई,
जिनको अपना कहता फिरा,
वे भी छाया होई॥
सुख-दुख दोनों एक समान हैं,
आते-जाते मेहमान,
जिस दिन मन ने जान लिया यह,
उसी दिन मिला पहचान॥
न मंदिर में, न मूरत में,
न शब्दों का विस्तार,
श्वास-श्वास में बैठा साईं,
देख सके तो सार॥
चल धीरे, रुक-रुक कर चल,
साँसों का रख मान,
आज मिले जो क्षण हैं तुझको,
वही तेरा भगवान॥
समय न ठहरे, तू भी न ठहर,
पर भीतर हो विश्राम,
वैराग्य नहीं जग से भागना,
सच का करना मान॥