कितना क्रूर हुआ इंसान

कितना क्रूर हुआ इंसान

मार रहा अब स्वयं इंसान,

प्रेम की भाषा भूल गया तू

शस्त्रों में उलझा,बना शैतान॥

धरती माँ कराह रही है

नदियों का आँचल सूख गया,

नौनिहालों को भी न छोड़ा

ईश्वर का मन भी टूट गया॥

लोभ, सत्ता, स्वार्थ के मारे

कितने सपने तूने मारे,

उठ मानव! अब भी सुधर जा

ईश्वर का भी है कुछ विधान॥

विनाश नहीं सृजन ही कर

यही तो जीवन, यही समर्पण,

प्रेम जगे फिर हर हृदय में

यही है सच्चा ईश्वर-धन॥

भूल गया तू कोरोना की त्रासदी

जब मारे-मारे फिरता था,

अस्त्र-शस्त्र सब व्यर्थ हुए थे

कहाँ गया तब तेरा ज्ञान॥

उठ जा अब मानव! सुधर जा

त्याग दे झूठा अभिमान,

धरती माँ की गोद में लौट

मत बन फिर क्रूर इंसान॥

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