हाँ, मैं अतिरिक्त हूँ
पर मैं भी तो इंसान हूँ,
न पुरुष, न नारी सही,
पर मेरा भी एक सम्मान है।
न मैं पुरुष, न नारी हूँ,
समाज से मैं परित्यक्त हूँ।
कभी पुरुष बन जाता हूँ,
कभी नारीत्व में अनुरक्त हूँ।
मैं भी शरीक होता हूँ
आपकी खुशियों के मेले में,
ढूँढता हूँ अपनी जड़ें रोज़
आपके ही इस खेल में।
पर नहीं जानता कहाँ से आया,
किसकी संतान हूँ मैं?
हाँ, मैं परित्यक्त हूँ,
पर फिर भी इंसान हूँ मैं।
मैं नृत्य करता हूँ, हँसता हूँ,
आपकी खुशियों में गाता हूँ,
पर मेरे भीतर भी वेदना है,
दिन-रात घुलता जाता हूँ।
न इसलिए कि पुरुष नहीं,
न इसलिए कि नारी नहीं,
बल्कि इसलिए कि घृणा का पात्र
समाज से मैं क्यों परित्यक्त हूँ?
कुछ लोग कहते “वृहन्नला”,
कुछ कहते “हिजड़ा, नपुंसक”,
पर मेरी भी धड़कनें हैं,
सपनों का भी है रश्मिक।
सिर्फ लिंग बदल जाने से
आत्मा नहीं बदलती,
फिर क्यों मुझको दुनिया कहे
कि मैं ‘अतिरिक्त’ हूँ?
मैंने भी भूमिका निभाई है,
मैंने भी युद्ध लड़े हैं,
कभी बना वृहन्नला मैं
कौरवों की सेना के छक्के छुड़ाए।
मैं ही था वह “अतिरिक्त”,
जिसे देख भीष्म पितामह ने
अस्त्र-शस्त्र धरे।
मैं ही था वासुदेव की ढाल
महाभारत के रण में।
मेरी भी अपनी कहानियाँ हैं,
मेरे भी अपने जौहर हैं।
नारी-पुरुष से कम नहीं मैं
त्याग, प्रेम, समर्पण में आगे हूँ।
फिर क्यों धिक्कार की पात्र हूँ,
केवल इसलिए कि
मैं एक “अतिरिक्त” हूँ?
सभ्य समाज वो नहीं कहलाए,
जो सबको समान सम्मान न दे।
परिवार में जन्मा माँ की कोख से,
फिर भी कूड़े के हवाले कर दे!
कितना वह रोया होगा,
कितना तड़पा होगा,
उसकी वेदना कौन समझता
क्योंकि वह तो “अतिरिक्त” है!
कैसे होते हैं वे माता-पिता,
जो भूल जाते हैं अपना ही अंश?
क्या उन्हें उस बच्चे की याद नहीं आती
जिसे मासूम होकर भी
ये कहकर छोड़ दिया कि
ये बालक “ अतिरिक्त” है ।