नियति अडिग पर्वत सम दिखती, कर्म प्रबल धारा बन जाता
मन संकल्पी हो तो राही, बाधा से भी मार्ग रचाता
भाग्य लिखे जो धूमिल रेखा, पुरुषार्थ उसे स्वर्ण बनाता
जिसने श्रम की ज्योत जलायी, अंधियारा सब दूर हटाता।।
बीज पड़े पथरीली धरती, फिर भी अंकुर फूट निकलते।
हाथों की मेहनत से सूखे, वृक्ष हरे रसधार पिघलते।
कर्म सजीव उमंग जगाकर, दाग सभी दिनरात सँवरते।
जैसे धूप गगन पे चढ़कर, तम-रूपी छाया को हरते।।
भोर धुँधलके में जग रुक जाए, वह क्यों पथ से डिगने पाता।
एक दृढ़निश्चय, एक प्रबल मन दुनिया का स्वर ही बदल जाता।
कर्म पुकारे ‘चल आगे’, और भाग्य स्वयं पीछे आता।
जीवन का नियम यही है जो श्रम करे, जग उसको गाता।।
कर्म-सुधा से जीवन पेयाघट, हर सुख-दुःख मधुरिम हो जाता।
मन दृढ़ रखते पग बढ़ता है, पर्वत भी इक रेखा बन जाता।
भाग्य अगर रूठा-सा दिखे, निश्चय फिर भी दीप्ति जगाता।
पुरुषार्थी जग जीत ही ले, धैर्य-सुमन जब मन में छाता।।
फूल खिले तो सुगंध बढ़े, काँटों से भी राह सँवर जाती।
सूरज भी नभ चीर निकलता, जब धरा अंधेरों से भर जाती।
श्रम की धुन में देवता जागें, थकी हवाएँ फिर तरुवर गातीं।
जीवन क्या एक तपोवन है, कर्म-दीप जिससे प्रज्वलित भाती।।
लहरों से टकरा कर देखो, नौका भी तूफानों को हरती।
आँधी में दीपक भी टिमटिम साहस हो तो लौ फिर जग धरती।
राह कठिन हो जाए चाहे, गति फिर भी कर्मों से संवरती।
जो चल दे विश्वास लिए, किस्मत उसकी चरण वंदित करती।।