जब टूटें जग के सब नाते, मौन हो जाए संसार ।
तब केवल एक सहारा, कृष्ण नाम अविकार ॥
बैठी थी पलंग पर उदास सी, उत्तरा भोली नारि
द्रौपदी ने स्नेह से समझाया, जीवन का विस्तार
कहा बेटी न देखो रिश्ते-नाते, न धन न परिवार,
विपदा में जो साथ निभाए, वही सच्चा आधार।
सभा बीच मेरी लाज लुटी थी, छूटा हर विश्वास,
पति, गुरु, कुल सब मौन रहे, रोता था आकाश।
भीष्म-द्रोण की आँखों से बस बहते थे अश्रु धार,
मानव सहारे सब ढह जाते हैं, संकट में हर बार।
थक कर द्रौपदी शरण गई ,छोड़ सकल अभिमान,
न काया सुध,न लोक लाज,बस गोविन्द का ध्यान।
“हे नाथ! तुम्हीं मेरे अपने”निकला हृदय पुकार,
क्षण भर में बदल गई विपदा, मिटा लज्जा भार।
द्वारिका में श्याम व्याकुल थे, ऋण आया याद अपार,
साड़ी फाड़ जो उँगली बाँधी, प्रेम किया स्वीकार।
भक्त पुकारे प्रेम सहित तो, टूटे हर व्यवहार,
दौड़ पड़े भगवान स्वयं ही, बचाने अबला की लाज।
श्याम दौड़े, चीर बढ़ा दी, बन गया अनंत धार,
हार गया अपमान सभा में, जीत गया विश्वास।
जब टूटें जग के सब नाते, मौन हो जाए संसार,
तब केवल एक सहाराकृष्ण नाम अविकार।