भक्त भक्ति और भगवान

भक्त, भक्ति और भगवान, तीनों एक ही धारा,

जिसने प्रभु की भक्ति पाई, जीवन उसका निस्तारा॥

मन में प्रेम हो सच्चा, तो दूरी मिट ही जाती,

अंतर से जो पुकारे, उसको राह मिल जाती।

पल में भर दें जीवन में, आनंद का फुहारा॥

भक्त, भक्ति और भगवान, तीनों एक ही धारा॥

भक्ति दीपक जैसी, खुद जल कर जग को बाँटे,

हर दुखियारों को अपना माने, सबके आँसू पोंछे।

सेवा से ही मिलता है, ईश्वर का दरबारा॥

भक्त, भक्ति और भगवान, तीनों एक ही धारा॥

भगवान कहीं बाहर नहीं, अपने भीतर वासें,

सत्य-धर्म की राह जो धरे, वही उनका दास है।

पावन हृदय में बसता है, हरि का नित उजियारा॥

भक्त, भक्ति और भगवान, तीनों एक ही धारा॥

जो छल-द्वेष को छोड़ दे, मन को निर्मल कर ले,

कर्म-योग के पथ पर चलकर, हर मुश्किल हल कर ले।

ऐसे मन में खिल उठता है, भक्ति का फूल निराला॥

भक्त, भक्ति और भगवान, तीनों एक ही धारा॥

भक्त अगर समर्पित हो तो, भक्ति स्वयं ही आए,

भक्ति जहाँ सच्ची हो जाती, भगवान वहीं मुस्काए।

तीनों मिलकर जीवन को, बनाते सुख-सागर सारा॥

भक्त, भक्ति और भगवान, तीनों एक ही धारा॥

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