मेरा सफ़र मेरी दास्ताँ

मेरा सफ़र मेरी दास्ताँ

समर्पण

“मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।”

“पितृपादोदकं तीर्थं, मातृवाक्यं हि मन्त्रवत्।”

इस जीवन-यात्रा का समस्त गौरव मैं अपने पूज्य पिताश्री

श्री राम नरेश त्रिपाठी जी तथा स्वर्गीय माताश्री रुक्मणी देवी जी के पावन चरणों में समर्पित करता हूँ।

आपका पुत्र होना मेरे लिए परम गर्व और सौभाग्य है।

प्रभु से मेरी यही प्रार्थना है कि जन्म-जन्मांतर में मैं आपका ही पुत्र बनकर आपका स्नेह और आशीर्वाद पाता रहूँ।

आपकी प्रेरणा ही मेरी साधना है।

यह आत्मकथा उसी साधना का विनम्र अर्पण है।

प्राक्कथन

मेरा जीवन परिचय, मेरी आत्मकथा, मेरा संस्मरणभला कौन पढ़ना और सुनना चाहेगा? फिर भी, मैं अपने प्रियजनों और मित्रों के बीच अपने जीवन में बिताए गए तमाम सुन्दर क्षणों और अनुभवों को साझा करना चाहता हूँ।

इसमें मेरी यह कोशिश रही है कि जिनसे भी मेरी नज़दीकियाँ रही हैं, या जिनसे मेरी मुलाक़ातें हुई हैं, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के केवल सकारात्मक पहलुओं की चर्चा की ही प्रधानता रहे। मेरा मानना है कि सभी व्यक्तियों में कुछ न कुछ गुण और दोष दोनों होते हैं, और हम उन्हें अपनी सोच के आधार पर सही या गलत का आंकलन कर लेते हैं, जो संभव है कि सच्चाई की कसौटी पर पूरी तरह खरे न उतरें। दूसरा कारण यह भी है कि मैं किसी के गुणों या दोषों को जाँचने-परखने वाला कौन हूँ? न ही मैं सक्षम हूँ, और न ही ऐसा करना चाहता हूँ, क्योंकि सुधार लाना है तो वह हमें स्वयं में लाना है।

मैं अपनी यह आत्मकथा बहुत दिनों से लिख रहा था, क्योंकि डायरी लिखना मेरी पुरानी आदत है। इसके प्रकाशन के लिए मैंने कभी गंभीरता से सोचा नहीं था। परन्तु एक दिन मेरे मन में स्वतः विचार आया कि जब लेख तैयार ही है, तो क्यों न इसे संकलित कर एक पुस्तक का रूप दे दिया जाए। मेरे बच्चों और मित्रों के लिए यह पुस्तक, मेरी ओर से स्मृति स्वरूप, एक सुन्दर भेंट होगी। यह उनकी गुज़री-बिसरी यादों को ताज़ा कराएगी और उन्हें जीवंत बनाएगी।

अपनी इस पुस्तक का नाम “मेरा सफ़र मेरी दास्ताँ” मैंने कुछ वर्षों पहले ही सोच लिया था, और यही नाम रखना चाहता हूँ।

प्रिय पाठकों, मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि आप मेरे जीवन के इन पन्नों को पढ़कर प्रतिक्रिया स्वरूप अपना आशीर्वचन अवश्य देंगे और मेरी लेखनी की सार्थकता को सिद्ध करेंगे।

मेरे जीवन का सिद्धांत रहा है:

चलता रहूँ कर्म पथ पर, पग पीछे मेरे न हटे।

सच्चाई की राह पर लेखनी मेरी न डिगे।

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जन्म और पैतृक पृष्ठभूमि

मेरा जन्म सन् 1958 में, भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन दिन, स्वर्गीय पंडित श्री राम नरेश त्रिपाठी जी के घर हुआ। मेरा स्थायी निवास ग्राम पूरे भोजा तिवारी, पोस्ट-शुकुल बाजार, तहसील- मुसाफ़िर खाना, ज़िला सुल्तानपुर (वर्तमान में अमेठी), उत्तर प्रदेश में है । मैं एक सरयूपारीण ब्राह्मण कुल से संबंध रखता हूँ ।

मेरी वास्तविक जन्मतिथि और स्कूल अभिलेखों में दर्ज तिथि में थोड़ा अंतर है। प्राथमिक पाठशाला अन्दीपुर, जिला सुल्तानपुर के प्रधानाध्यापक, आदरणीय स्वर्गीय श्री पारस नाथ पाण्डेय जी, जो मेरे पिताजी के घनिष्ठ मित्र थे, ने अपने मन से उस समय स्कूल रजिस्टर में मेरी जन्मतिथि 7 जुलाई 1958 दर्ज कर दी। यही आगे चलकर मेरी आधिकारिक जन्मतिथि बन गई। परंतु मैं अपनी वास्तविक जन्मतिथि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन दिन को ही मानता हूँ।

मेरा जिला सुल्तानपुर पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भूमि महर्षि वाल्मीकि जी, वशिष्ठ जी और दुर्वासा जी की तपोभूमि रही है। इसके अतिरिक्त, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और 1921 के किसान आन्दोलन की गाथाएँ भी इस जिले से जुड़ी हैं।

ग्राम पूरे भोजा तिवारी का नाम हमारे पूर्वज, पूजनीय स्वर्गीय बाबा भोजा तिवारी, जो एक महान संत थे, के नाम पर पड़ा। हमारे पैतृक निवास के मंदिर में हनुमान जी की एक सुंदर संगमरमर की प्रतिमा स्थापित है। कहते हैं कि बाबा जी ने अपने विवाह के अवसर पर इसे भेंट स्वरूप स्वीकार किया था। उनके भक्ति और साधना की छाया आज भी हमारे घर और गांव के वातावरण में महसूस की जा सकती है।

मुझे गर्व है कि मैं ऐसे महान पूर्वजों की वंशावली में जन्मा। उनके पुण्य और सुसंस्कृत जीवन के प्रताप से ही हमारे परिवार के सभी कार्य फलदायक और सफल रहे हैं। उनके आशीर्वाद और स्नेह के बिना आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह संभव नहीं था।

मेरी प्यारी जन्मभूमि गोमती नदी से इन्हौना–रुदौली मार्ग पर दक्षिण की ओर मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके चारों ओर का वातावरण ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत गौरवपूर्ण है।

• इसके उत्तर में भगवान राम की पावन जन्मभूमि

अयोध्या स्थित है।

• पूरब में भोलेनाथ की नगरी काशी।

• दक्षिण में प्रयागराज, और

• पश्चिम में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ।

इस प्रकार पूरा क्षेत्र एक तपोभूमि है, जहाँ हरि, हर, माँ लक्ष्मी, गंगा, सरस्वती और सभी देवी-देवताओं का पवित्र वास माना जाता है। यहाँ प्रयागराज तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध है, चित्रकूट पावन स्थल है, और गंगा, यमुना, सरस्वती का पवित्र संगम भी यहीं स्थित है। अयोध्या में पावन सरयू नदी बहती है।

ऐसी पुण्य धरा का मैं वासी हूँ और इसे अपने जन्म और पालन-पोषण का गौरव मानता हूँ।

मेरे पिताजी का नाम स्वर्गीय श्री राम नरेश त्रिपाठी जी और मेरी माताजी का नाम स्वर्गीय श्रीमती रुक्मणी देवी है । मैं चार भाई-बहनों में सबसे बड़ा हूँ। मेरे छोटे भाई हैं कृपानाथ, और मेरी दो बहनें हैं तपेश्वरी देवी तथा चंद्रेश्वरी देवी।

मेरे बड़े पिताजी से हम पांच भाई-बहन भी हैं उनमें मेरी बड़ी दीदी राजकुमारी, भाई देवनाथ, भाई हरिनाथ, और दो बहनें अरुण तथा सुनीता शामिल हैं। इन सभी में मेरी बड़ी दीदी राजकुमारी सबसे बड़ी हैं, जबकि बाकी सभी भाई-बहन मुझसे छोटे हैं। दुर्भाग्यवश, बहन अरुण का स्वर्गवास हो चुका है।

इस प्रकार, मैं अपने परिवार में सबसे बड़े पुत्र और सबसे बड़े भाई के रूप में अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का अनुभव करता आया हूँ।

हमारा उस समय एक संयुक्त परिवार था, जिसमें मेरे माता-पिता, बड़े पिताजी स्वर्गीय श्री रामसुमिरन तिवारी जी, बड़ी अम्मा जी, दोनों पिताजी के भाई-बहन और मेरी दो बूढ़ी आजी सभी साथ रहते थे। हम सभी भाई-बहन साथ-साथ खेले, कूदे, पढ़े-लिखे और बड़े हुए। आज सभी का अपना-अपना भरा-पूरा परिवार है और ईश्वर की कृपा से हम सभी खुशहाल जीवन जी रहे हैं।

उस समय हमारे संयुक्त परिवार में बड़ा पुत्र ही परिवार का मुखिया माना जाता था और उसके निर्णय सर्वमान्य होते थे। हमारे बड़े पिताजी स्वर्गीय पंडित श्री रामसुमिरन तिवारी जी हमारे परिवार के मुखिया थे। उनका स्वभाव थोड़ा कड़क था, पर भीतर से वे अत्यंत स्नेही, विनम्र और नेकदिल इंसान थे। उनके सामने जाने की हममें हिम्मत कम ही होती थी, क्योंकि वे अनुशासन के प्रति बहुत सख्त थे। उनके कठोर अनुशासन और स्नेह का सामंजस्य हमारे बचपन और परिवार के अनुभवों का एक विशेष हिस्सा रहा है।

बचपन में हमने गरीबी का वास्तविक अनुभव किया है। आज की तरह खुला हाथ नहीं था और परिवार का हर खर्च बजट के अनुसार चलता था। उस समय परिवार में केवल मेरे पिताजी की प्राथमिक विद्यालय में सरकारी नौकरी थी और खेती से कोई विशेष पैदावार नहीं होती थी। सिंचाई के साधन सीमित थे और पूरी फसल इन्द्र देव की कृपा पर निर्भर रहती थी।

कभी-कभी फसलें पानी की कमी या अत्यधिक वर्षा, ओलावृष्टि से नष्ट हो जाती थीं। सिंचाई का एकमात्र साधन नहर था, पर वह भी अक्सर पर्याप्त नहीं होती थी। नहर के पानी तक पहुँचने को लेकर गांव में आपस में तनातनी रहती थी। मुझे याद है कि मेरे पिताजी कई रातें खेतों में बैठकर बिताते थे, ताकि कोई अन्य किसान चुपके से पानी न ले जाए। हमारे यहाँ कुएँ और तालाब भी सिंचाई का माध्यम होते थे। बैलों द्वारा ‘पुढ़’ से पानी निकालकर या तालाब से दोगला लगाकर खेतों में पानी पहुँचाया जाता था। इन कठिन परिस्थितियों में हमने मेहनत, संयम और परिवार की एकजुटता को सीखा।

आजकल की तरह जुताई, बुआई और कटाई के आधुनिक उपकरण, ट्रैक्टर, उन्नत बीज या रासायनिक उर्वरक उस समय उपलब्ध नहीं थे। हमारे खेतों की जुताई हल और बैलों से होती थी। उस समय बैल घर की शान माने जाते थे। किसी किसान के पास कितने जोड़ी बैल हैं, इससे उसकी हैसियत और प्रतिष्ठा का अंदाजा लगाया जाता था। जब बुवाई का सीज़न आता था, तो पूरा इलाक़ा रंग-बिरंगे सजधजे बैलों की जोड़ियों से महक उठता था। यह दृश्य अत्यंत सुंदर और मनमोहक लगता था।

आज वही बैल, जिनके वंशज कभी हमारे परिवार के सदस्य जैसे थे, कितनी दुर्दशा झेल रहे हैं। उन्हें सड़कों के हवाले कर दिया गया है, वधशालाओं तक पहुँचाया गया हैयह दृश्य किसी से छिपा नहीं है। इस बदलाव ने मुझे अपने बचपन और ग्रामीण जीवन की सरलता, शालीनता और प्राकृतिक सौंदर्य की अहमियत और भी गहराई से महसूस कराई।

संयोग की बात है कि हमारी उम्रदराज पीढ़ी ने पुराना जमाना भी देखा और नया जमाना भी देख रहा है। बहुत कुछ बदल गया है; लगता है जैसे वह समय ही कुछ अलग था। आज उन बेज़ुबान पशुओं की दुर्दशा और कत्लेआम मुझे गहरी आत्मिक पीड़ा देती है। कहने को सरकार ने गोशालाएँ खोली हैं, परंतु यह सब अक्सर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। पशुओं का चारा भ्रष्ट अधिकारी चबा जाने में संकोच नहीं करते। वहीं, चमड़े और मांस के व्यापारी खूब मस्त हैं, क्योंकि उनके लिए यह मांस और चमड़ा अच्छी कमाई का साधन है। हमारे देश में गायों को गौमाता माना गया है, उनकी पूजा की जाती है, और मृत्यु के समय गोदान दिया जाता है ताकि गौ माता हमें मृत्यु के पश्चात वैतरणी पार कराए। दुर्भाग्यवश, हम ही अपने हाथों से उन्हें वैतरणी पार करवा रहे हैं।

यह सोचना दुखद है कि पाप और पुण्य की चिंता छोड़ दी जाती है और उस धंधे में अधिक लाभ को ही मुनासिब समझा जाता है। ये बदलाव मुझे अपने देश की सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनाओं पर गहरा विचार करने के लिए मजबूर करता है ।

उस समय कृषि कर्म को उत्तम दर्जे का कर्म माना जाता था। व्यवसाय को मध्यम, और नौकरी को निम्न दर्जे की श्रेणी में रखा जाता था। उस समय के सुप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक घाघ की कहावत बहुत मशहूर थी:

“उत्तम खेती मध्यम वान, निषिद्ध चाकरी भीख निदान।”

इस कहावत का मूल भाव था कि खेती और कृषि कर्म सर्वोच्च धर्म और आत्मनिर्भरता का मार्ग है।

आज की बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में यह कहावत पूरी तरह प्रासंगिक नहीं मानी जाती। नौकरी और व्यवसाय को अधिक स्थिर, सुरक्षित और सम्मानजनक माना जाने लगा है। फिर भी, इस कहावत का मूल संदेशजैसे आत्मनिर्भरता, मेहनत और प्रकृति से जुड़ावआज भी अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है।

यदि उस काल की बात की जाए तो लगभग हर गाँव में, सेठ-साहूकारों को छोड़कर, सभी परिवारों की आर्थिक स्थिति लगभग समान थी। एक ओर गरीब अपनी गरीबी से परेशान थे, तो दूसरी ओर धनाढ्य लोग सूद पर सूद बढ़ाने में लगे रहते थे। उस समय सूदखोरी और शोषण का बोलबाला था। गरीब परिवार कर्ज़ के बोझ तले जीवन बिताते थे। कई बार वे कर्ज़ चुकाते-चुकाते ही इस दुनिया से चले जाते थे, फिर भी साहूकारों का कर्ज ज्यों का त्यों बना रहता था। यह कर्ज उनके बच्चों को विरासत में मिल जाता और अगली पीढ़ी भी साहूकारों और जमींदारों के घर काम करने के लिए मजबूर रहती। इस तरह, गरीब परिवार बंधुआ मजदूर बनकर जीवन यापन करते थेयह अत्यंत दयनीय स्थिति थी।

यही कारण है कि आज भी पुराने अनुभवों और ऐतिहासिक असमानताओं को लेकर जाति-पांति में ईर्ष्या और द्वेष की भावना नवयुवकों के मन में घर कर गई है। यह सुदृढ़ समाज की एकता और भाईचारे के लिए उचित नहीं है। उस समय का सामाजिक ताना-बाना, वर्ण व्यवस्था और व्यवसाय विशेष परिस्थितियों के अनुसार थे। आज की परिस्थितियाँ पूरी तरह अलग हैं। फिर भी कुछ कुत्सित मानसिकता वाले नेता इस पुरानी बात को अपने राजनैतिक लाभ के लिए समय-समय पर उठाकर आग में घी डालते हैं और अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि समाज को पुरानी कड़वाहट और मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुटता, भाईचारा और आपसी समझदारी के मार्ग पर चलना चाहिए।

गाँव के रिश्तों की मिठास

गाँवों में रिश्तों की बात करें तो उनकी अहमियत शहरों से बिल्कुल अलग दिखती है। वहाँ जाति या समुदाय कोई भी होमोची, धोबी, नाई, लुहार, कुम्हार या घर का नौकर

हर किसी को हम रिश्तों में बाँधते हैं। किसी को काका, किसी को दादा कहकर पुकारते हैं, और यही संबोधन हमें एक गहरे प्यार के बंधन में जोड़ देता है।

पुराने समय में जाति व्यवस्था के भीतर भी यही आपसी सामंजस्य समाज को जोड़कर रखता था। आज भी यह परंपरा जीवित है, हालाँकि इसकी मिठास में पहले जैसी गहराई कम होती जा रही है। इसे सहेजना और आगे बढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि यही रिश्तों की वह ताक़त है जो हमें इंसान बनाती है।

चूँकि आर्थिक संकट समाज में व्याप्त था, इसलिए चोरी और डकैती आम बातें थीं। मेरे घर और ससुराल में भी कई बार चोरी और डकैती हुई। बदमाश घर का सारा माल चंपत कर ले जाते थे। उस समय परिवहन के साधन बहुत सीमित थे। लोग साइकिल, बैलगाड़ियाँ, ताँगा, घोड़े और खच्चर का उपयोग करते थे। मोटर साइकिलें केवल सीमित लोगों के पास होती थीं, और चार पहिया वाहन रखने वालों को उस समय धनाढ्यों की श्रेणी में माना जाता था।

बचपन से ही मैं पढ़ाई में मेधावी विद्यार्थी था। छोटी उम्र में ही मैं अपनी दीदी के साथ स्कूल जाने लगा। मेरे पिताजी स्वयं एक शिक्षक थे और उनके दृष्टिकोण के कारण स्कूल में सभी अध्यापक मेरे प्रति विशेष ध्यान रखते थे।

छोटा-सा दुबला-पतला बच्चा,

कंधे पर कपड़े का सिला बस्ता लटकाए,

हाथ में तख्ती और दवात लिए

गाँव की गलियों से होकर

धीरे-धीरे स्कूल की राह पकड़ता था।

टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ,

मिट्टी में खेलती चींटियाँ,

पेड़ों से झरते पत्तों की सरसराहट

सब मेरे साथी थे।

गली के मोड़ पर बैठे बूढ़े बाबा

मुस्कान बिखेर देते,

कभी किसी के आँगन से आती

रोटी सेंकने की खुशबू

मेरे पाँवों को रोक लेती।

पाँव में चप्पलें नहीं,

बस धूल भरे निशान,

और मन में किताबों के सपने।

स्कूल की घंटी जब दूर से सुनाई देती,

तो लगता मानो पूरी धरती

मुझे पुकार रही हो।

आज भी जब स्मृतियों की खिड़की खुलती है,

तो वही गलियाँ सामने आ खड़ी होती हैं।

वो पगडंडियाँ अब शायद बदल गई होंगी,

पर उनकी पहचान

मेरे मन की मिट्टी में अब भी अंकित है।

मेरे प्राइमरी स्कूल अन्दीपुर के प्रांगण का वो बड़ा सा बरगद का वृक्ष जिसके नीचे टाट की बोरी बिछा कर मैं पढ़ता था, आज भी मुझे याद है। मैं अपना पाठ बहुत जल्दी याद कर लेता था, कंठस्थ करने में माहिर था, पंडित जी मुझे रट्टू बच्चा कहते थे, यहाँ तक कि गणित का सवाल भी रट लेता था । कभी कभी तो पंडित जी की डाँट से भी बच जाता था उनके मन में मेरे प्रति इतना विश्वास था कि इस बच्चे को तो याद ही होगा क्या पूछूँ और आगे बढ़ जाते थे, मैं बहुत गर्वित होता था कि तेज विद्यार्थी होने का ठप्पा ही मुझे आज बचा गया पर मैं आगे के लिए सचेत हो जाता था और घर पहुंच कर सबसे पहले वही प्रश्न रटता था ।

परिवार में मेरी दीदी सबसे बड़ी थी वह मेरा बहुत ख्याल रखती थी और आज भी रखती हैं उनके बाद घर में पहला बेटा मैं ही था तो स्वाभाविक है लाड़ प्यार भी बहुत था और कुछ नकचढ़ा भी हो गया था, बात बात पर ग़ुस्सा करना, हर काम को अपनी मर्जी से करवाना, मांग न पूरी हो तो आसमान सर पर उठा लेना, मेरे स्वभाव में घर बस गया, कारण डाँट मिलती ही नहीं थी, जो मैं कहता था वही सब सही था । पिताजी डांटते थे तो मेरी दोनों आजियां बीच में ढाल बनकर आ जाती थी पर ऐसा नहीं था दोस्त कि मैं ग़लत रास्ते पर था , केवल स्वभाव में चिड़चिड़ापन था, ज़िद्दी पन था। धुन का मैं पक्का था, परिश्रमी था, अपने काम को समय से पहले करता था, जो मन में सोच लेता था पूरा करके ही छोड़ता था, संस्कारी था बड़ों का यथोचित सम्मान करता था, अपने भाई बहनों और माँ बाप से बहुत प्यार करता था, घर का पूरा काम करता था । बचपन से ही मैं महत्वाकांक्षी था जीवन में बहुत कुछ करने की ललक थी, कल्पनाओं की दुनिया में उड़ता रहता था ।

देखा जाये तो बचपन की यादें स्मृतियों में जीवन भर बनी रहती हैं और ये यादें चाहे खट्टी रही हों या मीठी, बहुत ही मधुर लगती हैं, क्योंकि वे तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप थीं, बस कोई हल्की सी चर्चा छेड़ दे, घंटों का समय बचपन की कहानी सुनाने में कब बीत जाता है, पता नही चलता है, यही लगता है बचपन के वे दिन बहुत सुहाने थे ।

बचपन की शाखें कोमल थीं नन्ही हँसी में उजियारा था

बड़े हुए तो काँटे निकले, मन में भी अब किनारा था।

कोमलता धीरे-धीरे खोई, मासूमियत यादों में सोई।

फिर भी दिल पुकारे हर क्षण लौट आओ बचपन के दिन।

बड़े बाबाजी – स्वर्गीय श्री राम बिहारी “तिलंगा बाबा”

मेरे आदरणीय बड़े बाबाजी, स्वर्गीय श्री राम बिहारी उर्फ़ तिलंगा बाबा के सामने मैं पैदा भी नहीं हुआ था। मेरी आजी मुझे बताती थीं कि आप एक सच्चे फौजी थे, जिनमें देशभक्ति का जज़्बा रग-रग में भरा हुआ था। देश के प्रति आपकी निष्ठा और समर्पण अद्वितीय था।

युवा अवस्था में ही आपने घर से भाग कर फौज में भर्ती होने का साहस दिखाया। उस समय अंग्रेजों का शासन था और उनके अधीन कार्य करना पड़ता था, परंतु आप हमेशा अपने लोगों का पूरा ध्यान रखते थे। दुर्भाग्यवश, जहां तक मैंने सुना है, ड्यूटी से घर लौटते समय आपके साथ किसी असामयिक घटना ने जन्म लिया, जिसका विवरण आज भी जाँच का विषय है।

आप धर्मात्मा, हनुमान भक्त और उच्च चरित्र वाले व्यक्ति थे। आपके जीवन और आदर्श ने परिवार में हमेशा शांति, निष्ठा और भक्ति की प्रेरणा दी।

छोटे बाबाजी – स्वर्गीय श्री माता प्रसाद तिवारी जी

मैं लगभग चार-पाँच वर्ष का रहा होगा, तभी मेरे छोटे बाबाजी स्वर्गीय श्री माता प्रसाद तिवारी जी का देहावसान हो गया। उस समय मैं अबोध बालक था, इसलिए जीवन और मृत्यु की गहनता को समझ नहीं पाया। आज भी थोड़ी-थोड़ी आपकी झलक मेरे मन-मस्तिष्क में उभर जाती है। याद है कि आपके जीवन के अंतिम समय में मैं आपकी चारपाई के पास खड़ा था। मेरी आजी ने मुझे आपके सामने प्रस्तुत किया और बताया कि यह आपका पोता है। आपने मुझे देखा और आशीर्वाद दिया और आपके नेत्रों से आंसू भी गिरे। क्यों न गिरते, मूल से व्याज अधिक प्रिय होता है और आप इसी दुनिया से विदा ले रहे थे।

उस समय मुझे मृत्यु क्या होती है, क्यों होती है, और लोग किस दुनिया में चले जाते हैंसमझ में नहीं आया। घर में बताया गया कि सभी लोग भगवान के पास चले जाते हैं और कुछ समय बाद फिर इसी धरती पर नए जन्म लेकर आते हैं। इसी विश्वास में मैं खुश था कि आप कहीं न कहीं फिर जन्म लेंगे।

मेरी आजी

मेरी दो आजी थीं।

बड़ी आजी स्वभाव से थोड़ी कड़क थीं। घर में बहुत कम लोगों से उनकी घुल-मिल थी, पर मेरे लिए उनका स्नेह कुछ और ही था। वे सबकी बातें काट देतीं, पर मेरी बात कभी नहीं टालती थीं।

मेरी छोटी आजी तो मेरे लिए माँ से भी बढ़कर थीं। उनका प्यार और स्नेह मेरे लिए अमृत-तुल्य था। मजाल है कोई मुझे कुछ कह देवे बर्दाश्त ही नहीं करती थीं। उनके अंतिम समय में मैं उनसे मिल नहीं पाया, यह बात आज भी मेरे मन को गहराई से दुख देती है।

मेरी दोनों प्यारी आजियों को मैं दिल से नमन करता हूँ।

उनकी यादें आज भी मेरे जीवन को उजाला देती हैं।

मेरे पूज्य पिताजी – स्वर्गीय श्री राम नरेश त्रिपाठी जी

पिता का प्यार अपने बच्चों के लिए हमेशा अमृत तुल्य होता है। एक पिता अपने बच्चों में अपनी छवि खोजता है, अपने उत्तराधिकारी को ढूँढता है, जो उसका नाम रोशन करे और वंश की वृद्धि करे। मेरे पिताजी मुझे दिल से बहुत प्यार करते थे और मेरी हर इच्छा पूरी करने का प्रयास करते थे।

आप अत्यंत भावुक, सहृदय, परम ज्ञानी, प्रतिष्ठावान, समाजसेवी और प्रखर प्रवक्ता थे। बड़े-बड़े लड़ाई-झगड़ों को आप मध्यस्थता से सरलता से सुलटा देते थे, और इसी कारण समाज में आपके प्रति बड़ी श्रद्धा थी। आप हमेशा न्याय संगत फैसले लेते थे, साफ़ बात करते थे, और मन में कोई छल-कपट नहीं होता था। सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि आप रिश्तों को निभाते थे और किसी की पीड़ा से आप स्वयं आहत हो जाते थे।

दुख की बात यह थी कि आप हमेशा वात रोग से परेशान रहते थे। ठंडी में चलना-फिरना भी कठिन होता था। मुझे एक वाक़या याद हैएक दिन पिताजी ने मुझे किसी बात पर डाँट दिया। मैं मन ही मन उनसे बहुत नाराज़ था। संयोगवश, गाँव के एक बड़े भ्राता और आपके प्रिय शिष्य श्री डॉ. जगदीश प्रसाद मिश्रा जी मेरे पिताजी के इलाज के लिए आए। उन्होंने न्यूरोवियान का इंजेक्शन लगाया, और उस समय मेरी ज़बान फिसल गई“टिट फ़ार टैट” अर्थात् “जैसे को तैसा” निकल गया। डॉ. साहब ने मुझसे हँसते हुए कहा, “तुम्हारे पिताजी बीमार हैं, यह कैसे कह दिया?” पिताजी ने मन ही मन मुस्कुराते हुए मेरी नाराज़गी का वृत्तांत बताया। कारण सुनकर हम सभी हँस पड़े। यह घटना मेरे पिताजी के असीम प्यार और धैर्य की स्मृति आज भी है।

एक और वाक़या याद है। मुझे जगदीशपुर जाना था, जो मेरे गाँव से 18 किलोमीटर दूर है, वार्षिक परीक्षा के लिए। उस समय मैं कक्षा आठ में पढ़ रहा था। पिताजी भोर में मुझे साइकिल पर बैठाकर निकल पड़े। रास्ते में साइकिल की चैन बार-बार उतरती रही और कोई मरम्मत की दुकान भी नहीं थी। बावजूद इसके, मेरे पिताजी बार-बार साइकिल की चैन लगाकर मुझे समय पर परीक्षा कक्ष तक पहुँचा दिया। उनके साहस, संघर्ष और धैर्य का यह अनुभव आज भी मुझे प्रेरित करता है।

आप केवल अपने बच्चों के लिए आदर्श पिता ही नहीं थे, बल्कि विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए भी मसीहा थे। आपके पढ़ाए हुए बच्चे समाज में उच्च पदों पर आसीन हुए। मेरे लिए भी प्रथम शिक्षक हमेशा मेरे पिताजी ही रहे और मेरे मन में उनका स्थान सर्वोच्च है।

एक और प्रेरणादायक वाक़या याद है। आप रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन के लिए मेरे साथ मेडिकल कॉलेज जा रहे थे। रास्ते में आपने मुझसे साझा किया कि यदि आपका कुछ हो गया, तो आपके विद्यालय की एक गरीब छात्रा का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा, क्योंकि कुछ कुत्सित विचारों वाला साथी शिक्षक उसके लिए गलत सोच रखता था। आपकी यह सार्थक चिंता और परिवार की सीमाओं से ऊपर उठकर दूसरों के कल्याण के लिए जागरूकता दिखाती है कि आप कितने महान शिक्षक और मानव थे।

मेरे पिताजी का जीवन, उनका प्रेम, धैर्य, न्यायप्रियता और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता मेरे लिए अनमोल आदर्श हैं। उनकी तुलना में और कोई शिक्षक मेरे लिए आदर्श हो ही नहीं सकता। कोटि-कोटि नमन!

पिता के प्रति श्रद्धांजलि

आपने मुझे इस संसार में जन्म दिया, एक आदर्श जीवन जीने के सही रास्ते दिखाए और हृदय से इतना प्यार दिया कि मैं आज भी उस प्रेम को महसूस करता हूँ। दशकों बीत गए हैं, परन्तु पिता जी, मैं आपको अब भी नहीं भूल पाया हूँ। यह हमारे परिवार के लिए एक बड़ा दुःखद दुर्भाग्य था कि 19 नवम्बर 1992 को हमने आपको असमय ही खो दिया।

आपने अपने संपूर्ण जीवन को संघर्षों में जिया। सभी बच्चों का पालन-पोषण, शिक्षा और विवाह की जिम्मेदारियाँ अपने रहते पूरी कर दीं। जब आपको सुख भोगने का समय आया, तो नियति ने ऐसा न होने दिया। हम लोग आपकी छत्रछाया से ही मरहूम हो गए।

मुझे याद हैं आपके अंतिम शब्द, जो आपने मेडिकल कॉलेज, लखनऊ में डॉक्टर से कहे थे:

“मैं मरना नहीं चाहता।”

ये शब्द आज भी मेरे मन में गूंजते हैं, और मुझे गहन पीड़ा देते हैं। उस क्षण मैं किंकर्तव्यविमूढ़, शून्य सा खड़ा रहा। कभी डॉक्टर साहब की भाव-भंगिमा को परख रहा था, तो कभी पिता जी के अनुनय भरे युगल हाथों पर ध्यान दे रहा था।

कौन चाहता है कि वह अपने भरे-पूरे परिवार को छोड़कर असमय इस दुनिया से चला जाए? पर मृत्यु ने आपको अपनी ओर खींच लियाया यह मोक्ष की ओर यात्रा थी। आपकी ये स्मृतियाँ मेरे मानस पटल पर गहरे अंकित हैं। अवसर पाकर ये स्मृतियाँ उभर आती हैं, और दिन गुजरने के बावजूद मैं आपको नहीं भूल पा रहा हूँ।

मैं पुरानी यादों में ढूँढता हूँ एक धुंधली परछाई, जैसे कोई पुत्र अपने पिता की ऊँगली पकड़े निश्चिंत चलता हो।

आपका पुत्र होने पर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ। ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि मैं इस मृत्युलोक में और हर जन्म में आपका पुत्र बनने का सौभाग्य प्राप्त कर सकूँ, आपका प्यार और आशीर्वाद पा सकूँ।

मेरी पूज्य अम्मा जी स्व० श्रीमती रुक्मणी देवी

मेरी प्यारी अम्मा जी तो बहुत ही सीधी साधी, साध्वी जैसी सरल जीवन यापन करने वाली, दयालु और परोपकारी महिला थी, “ न क़ाहू से लेना न क़ाहू को देना” । आपको गाँव के अपने घर की ड्योढ़ी ही ज्यादा प्यारी थी, कुछ दिनों की बात बच्चों के पास रहने की बात अलग थी पर ये सच्चाई है कि गांव की ड्योढ़ी बुजुर्गों को घर से बाहर नहीं निकलने देती, जब तक कोई खास मजबूरी न हो ।

यह एक विचारणीय प्रश्न है, सभी बुजुर्गों के साथ है ,एक ओर गांव का खुला रहन सहन, बड़ा सा घर द्वार और दूसरी ओर शहर के दो तीन कमरों वाले फ्लैट, कैसे उन्हें पसंद आयेगा ? गाँव की शुद्ध आवो हवा शहर में कहाँ है, खेत खलिहान कहाँ है, आपसी प्रेम मेल मिलाप कहाँ है, बैठ कर घंटों संवाद करने का समय कहाँ है, हाँ है केवल मशीनरी जिंदगी जब रात में थक हार घर आओ बिना बच्चों को मिले, भोजन किये ड्राइंग रूम में ही पड़े सोफे पर सो जाओ, यही कारण था कि मेरी अम्मा जी का मन शहर में नहीं लगता था । मैंने शहरों में पार्क के बेंचों पर बैठे गाँव से आये बुजुर्गों की उदासीनता उनके चेहरों पर पढ़ी है, उनके चेहरों पर अकेलेपन की पीड़ा देखा है, गुमसुम से वे बैठे रहते हैं कोई जान पहचान का होता नहीं तो किससे बात करें । खुश रहने के लिये अपने यार दोस्त चाहिए, अपना समाज होना चाहिये, अपने नाते रिश्तेदार चाहिए अपना वतन चाहिए ।

प्रायः गाँवों में किसी न किसी के यहाँ तो कुछ न कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते ही रहते हैं हर त्यौहार और संस्कार धूप धाम से मनाये जाते हैं, आप इसी में व्यस्त रहती थी । आप हमेशा इसी चिन्ता में रहती थी कि

घर में खूंटे पर बंधी उस भूखी गाय को कौन चारा देता होगा, घर पर आने वाले रिश्तेदारों का कौन स्वागत सत्कार करता होगा, आदि नाना प्रकार की चिन्तायें मन में पाले रहती थी, जिसका निराकरण मेरे साथ शहर में रहकर तो संभव नही था । परन्तु ये मेरा सौभाग्य रहा कि बीच बीच में मेरी जहाँ पर भी पोस्टिंग होती थी चाहे ऊंचाहार हो, चाहे लखनऊ या नोएडा हो या झज्जर हरियाणा हो, आपका आना जाना लगा रहता था, ये मेरी माँ के अपने बच्चों के प्रति अगाध प्रेम का द्योतक था । मेरी अम्मा जी मेरे पिताजी का नाम अपने मुख से कभी नही लेती थी, उनका कहना था कि पति का नाम लेने से पति की उम्र क्षीण होती है ।

पूज्य अम्मा जी आप जून वर्ष 2016 में लंबी बीमारी के बाद असमायिक हमें छोड़कर परम धाम चली गयी, आपसे बिछुड़ना आपके पूरे परिवार के लिए बहुत ही पीड़ादायक रहा । पिताजी तो थे नही, आप भी साथ छोड़ चली, क्या जल्दी थी, लगता है पिताजी जी ने आवाज़ लगाई होगी अब आ ही जाओ मेरे पास , मुझे अकेले यहाँ अच्छा नहीं लगता है । मैं अपनी इन पंक्तियों के माध्यम से आपको सादर श्रद्धांजलि देता हूँ ।

हे माँ ! जब भी दर्द उठा दिल में है

मैंने तुझको ही पाया है ।

तेरी ममता की छाँव में

संसार का सुख मुझे मिलता था,

तेरी हर बातों पर

दिल को सुकून मुझे मिलता था,

जब भी चोट मुझे लगती थी

तुझे आहट हो जाती थी,

हे माँ ! जब भी कष्ट में होता हूँ

मैंने तुझको ही पाया है ।

तुझसे ही सीखा बोलना

तू से ही चलना सीखा,

तुझसे ही जीवन का बोध हुआ

तुझे देख कर मुस्कुराया,

तुझने सिखाया सूरज जैसा तपना

और चाँद सा शीतल रहना,

जीवन में जो कुछ भी सीखा है

तुझसे ही मैंने सीखा है ।

तूने ही मेरे जीवन में रंग भरे

दिखाये सुन्दर सलोने सपने,

आधार शिला तू ही मेरी

आज अपने बल पर हम खड़े हुए,

सपनों में मुझसे मिलने आती हो

आरती का थाल लेकर ,

खुश रह सदा तू मेरा बेटा

प्रणम्य माँ ! आशीष पाया है ।

बडे पिताजी स्व० श्री राम सुमिरन तिवारी जी

मुझे अपने बड़े पिताजी का प्यार बचपन में बहुत मिला, आपने मुझे अपनी गोद में खिलाया । छोटे पिताजी तो स्कूल चले जाते थे, दिन भर तो मैं आपके साथ ही रहता था, आपके प्यार को मै कैसे भूल सकता हूँ । पिताजी स्कूल संभालते थे तो आप खेती पाती का कार्य भार देखते थे । ये मेरा सौभाग्य रहा कि आपके साथ बचपन में खेती के कार्यों में मैं भी हाथ बँटाता था, यही कारण है कि खेती के बारे में मुझे भी कुछ अनुभव है ।

हरफ़नमौला व्यक्तित्व, विपरीत परिस्थितियों में भी तटस्थ रहने की अद्भुत क्षमता और अपनी ही साधना में रमे हुए एक सिद्ध योगीऐसे थे हमारे पूज्य बड़े पिताजी ।

आप शास्त्र-पारंगत, वेद-विशारद, भागवत-वाचक और रामचरितमानस के कुशल चितेरे थे। शास्त्रार्थ का गहन प्रेम, गायन की अद्भुत शैली और लोक परंपराओं के प्रति अनुराग आपको विलक्षण बनाता था। श्रावण के गीत हों, आल्हा-ऊदल की वीर-गाथाएँ हों या फाल्गुन की फगुआ की रंगतआपकी वाणी पर श्रोता झूम उठते थे।

आज भी आपकी स्मृतियाँ हमारे मन को आलोकित करती हैं। यद्यपि हम अबोध थे और आपके गहन ज्ञान का पूरा लाभ न ले सके, फिर भी आपके आशीर्वाद और प्रेरणा से ही हमारी सृजन-यात्रा संभव हो रही है। प्रणम्य बड़े पिताजीआपको शत-शत नमन। आपकी शिक्षाएँ और प्रेरणा हमारे लिए सदा मार्गदर्शक बनी रहेंगी।

मेरी बड़ी अम्मा जी

मेरी बड़ी अम्मा बहुत ही सीधी-सादी, अपने काम से मतलब रखने वाली और धार्मिक महिला थीं। उन्होंने सरल जीवन यापन किया और हम सभी बच्चों को अपना भरपूर स्नेह दिया। उनका जीवन सदैव संतुलित, शांत और प्रेमपूर्ण रहा।

आपने अपने जीवन में हमेशा बच्चों के साथ रहकर उन्हें प्यार और मार्गदर्शन दिया। दुःखद पहलू यह रहा कि आप पहली बार मेरे अनुज भाई देवनाथ तिवारी जी के घर दिल्ली गईं। वहीं अचानक बीमार पड़ गईं और कई इलाज के बावजूद स्वस्थ न हो पाईं। हम सभी का साथ छोड़कर नियति ने आपको अपने पास बुला लिया।

आपकी यह पुण्य आत्मा हमेशा हमारे मन और स्मृतियों में जीवित रहेगी।

मेरे भाई और बहनें

मेरे भाइयों और बहनों का जीवन कठिन परिश्रम और लगन से भरा हुआ है।

  • मेरे भाई कृपानाथ त्रिपाठी एक सरकारी शिक्षक हैं। वे शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत होने के साथ-साथ खेती-बाड़ीऔर गाँव के समाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहते हैं।
  • मेरे चचेरे भाई देवनाथ तिवारी दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करते हैं। वे बहुत ही मिलनसार और सहयोगी व्यक्तित्व के धनी हैं।
  • दूसरे देवनाथ तिवारी गाँव में खेती-बाड़ी और अपने घर की जिम्मेदारियाँ संभालते हैं।अपने काम से काम रखते हैं ।

सभी भाइयों की बेटियों की शादी हो चुकी है, जबकि उनके बेटे अभी पढ़ाई कर रहे हैं। सभी मेहनती हैं और अपने प्रयासों से जीवन में सफलता प्राप्त करेंगे।

मेरी सभी बहनों के परिवार भी सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस तरह मेरा परिवार एकजुट, मेहनती और पारिवारिक मूल्यों में विश्वास रखने वाला है।

ननिहाल पक्ष

मेरे नाना, आदरणीय श्री रामहर्ष तिवारी जी, मेरी प्यारी नानी जी और दोनों मामा जी – श्री ठाकुर प्रसाद तिवारी जीएवं गंगाधर तिवारी जी – ने मुझे हमेशा खूब प्यार दिया। मेरे नाना जी मुझे ‘लालम’ कहकर पुकारते थे। जब भी उनसे मिलते, मुझे कुछ न कुछ गिफ़्ट या पैसे जरूर देते थे। इसी नाम के कारण मेरे गाँव में मुझे ‘रामलल्लन’ के नाम से भी जाना गया, और आज भी बड़े बुजुर्ग मुझे इसी नाम से पहचानते हैं।

मेरी नानी मुझे बहुत प्यार करती थीं, मुझे खूब खिलाती थीं। स्कूल की गर्मियों की छुट्टियों में मैं हमेशा छोटे मामाजी के साथ नानी के पास चला जाता था। ननिहाल बच्चों के लिए अपना घर जैसा ही होता है, और मैं वहाँ कभी असहज महसूस नहीं करता था।

मेरे बड़े मामा गंभीर और कड़क स्वभाव के व्यक्ति थे। कम बातें करते, परंतु हर निर्णय में न्यायप्रिय और अनुशासनप्रिय थे। मेरे छोटे मामा बिलकुल उलट खुले, हँसमुख और बातचीत में सरल थे। वे फक्कड़ जीवन जीते थेअविवाहित रहे, घर में शादी का दबाव आया तो दूर चले गए। किसी प्रकार का धन, लोभ या स्वार्थ नहीं रखते थे। जीवन में जो मिला वही पर्याप्त था। उनके साथ मेरी दोस्त जैसी बातचीत और निस्पृह स्नेह हुआ करता था।

छोटे मामा ईश्वर में श्रद्धा रखते थे, पर मूर्ति पूजक नहीं थे। धर्मग्रंथों जैसे रामायण, गीता, पुराण आदि पढ़ना उनका प्रिय नहीं था, पर वे निर्गुण भजन खूब गाया करते थे। वे भूत-प्रेत, अंधविश्वास और आडम्बर के कट्टर विरोधी थे। अकर्मण्यता उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थी और अनुशासनप्रिय थे। सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे दिल के सच्चे थे। मैंने अपने छोटे मामा के बारे में अधिक लिखा क्योंकि मैं उन्हें बहुत प्यार करता था, और आज भी उनकी यादें मेरे लिए जीवित हैं।

यह संसार नश्वर है। लोग इस खूबसूरत दुनिया में आते हैं, जुड़ते हैं, और एक दिन विदा हो जाते हैं। पर यादें, वह अमूल्य धरोहर, हमेशा जीवित रहती हैं।

ग्रामीण खेलकूद, त्यौहार एवं शादी-ब्याह

गांव का बड़ा सा घर, विशाल आँगन, खुला दालान, विस्तृत द्वार और बाग़ की शुद्ध हवा किसके मन को नहीं भाएगी! बचपन के हुड़दंग भरे दिन आज भी स्मृतियों में जीवित हैं।

हम खेलते थे गुल्ली-डंडा, अखाड़ा-कूद, कुश्ती, कबड्डी, पतंग उड़ाना और लुकाछिपी। नहरों और पोखरों में नहाते, काग़ज़ की नाव पानी पर तैराते, उड़ती तितलियों को पकड़ कर फिर छोड़ देते।

कड़ी धूप में घर से निकलना,

जूते-चप्पल चुपके से खिसकाना,

रास्ते में उड़ती तितलियों को पकड़ना,

फड़फड़ाती उन्हें देख फिर छोड़ देना,

काग़ज़ की नैया पानी पर तैराना,

चींटों को शरारत से उस पर बैठाना।

बचपन की ये बातें, मिट्टी के रंग-बिरंगे खिलौनों, खेतों की पगडंडियों, झूलों और सावन की कजरी गीतों के साथ जुड़ी हैं।

गांव में त्यौहार और संस्कार बड़े धूमधाम से मनाए जाते थे। होली, फाग, नागपंचमी और सावन का उत्सव पूरे गांव में हर्षोल्लास फैलाता। शादी-ब्याह की मस्ती निराली थी। महीनों पहले मेहमानों को आमंत्रित किया जाता, आगंतुक पहले से आकर ठहरते, और साझा भोजन होता। तीन दिन तक शादी के मांगलिक कार्यक्रम आयोजित होते, वर और वधु के लिए विशेष परिधान और राजकुमार जैसी शान का इंतज़ाम होता।

बरात में घोड़े और हाथियों को विशेष महत्व मिलता। मेरी शादी भी इसी तामझाम के साथ संपन्न हुई। मैं दूल्हे के रूप में पीनस पर बैठा और ससुराल गया। मज़ेदार बात यह है कि वापसी में श्रीमती जी ने पीनस पर कब्ज़ा कर लिया, और यह परंपरा आज भी जारी है!

मेरी शादी के लिए मेरे पिताजी के मन में बहुत अरमान थे। वे महीनों पहले से लोगों को निमंत्रित करना शुरू कर देते थे और शादी को भव्य बनाने के लिए जी-जान से जुटे रहते थे। बारात में गाड़ी, हाथी और घोड़े अधिकतम संख्या में लाना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था।

बरातियों का भी अपना रुतबा होता था। कन्या पक्ष से सेवा कराना उनके जन्मसिद्ध अधिकार की तरह था। हर मांगलिक अवसर पर वे मूँछों में ताव देकर बैठते, इत्र लगाते और पान की गिलौरियाँ चबाते, शान से ऐंठ कर चलते जैसे कोई शहंशाह हों। लेकिन घर पहुँच कर अपनी असलियत में लौट आते। आजकल यह दादागिरी कम हो गई है, फिर भी कहीं न कहीं सुनाई देती रहती है।

गांवों में भाईचारा और सहयोग की मिशाल मिलती थी। एक दूसरे के यहाँ आना-जाना, सुख-दुख में साथ खड़ा रहना, तीज-त्यौहारों में भेंट देना, ये सब रीति-रिवाज और कर्तव्य माने जाते थे। बड़े आयोजन आपसी सहयोग से संपन्न होते थे। आत्मीयता और मानवता ज़िंदा रहती थी। बड़ों का यथोचित सम्मान मिलता था और संकट में सब साथ खड़े रहते थे।

पुराने समय में घर के बाहर के काम गृहस्वामिनी और पुरुष संभालते थे, घर के अंदर के काम बहुएँ और बेटियाँ करती थीं। संयुक्त परिवार होने की वजह से घर का काम सदस्यों में बंटा हुआ होता था। यदि कोई सदस्य बीमार हो जाता या कहीं चला जाता, तो उसका काम भी साझा किया जाता।

मेरी आजी कहती थीं कि घर की बहुओं और बेटियों को जरूरत से ज्यादा हँसना-बोलना नहीं चाहिए, इसे मर्यादा का प्रतीक माना जाता था। आज के विचारक इसे नारी पराधीनता कहते हैं, तो कुछ इसे संस्कार और परंपरा से जोड़ते हैं। नारी स्वतंत्रता आज का ज्वलंत मुद्दा है, जिसमें लोग अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं।

देखा जाये तो प्राचीन काल से संयुक्त परिवार ही हमारे देश की पहचान रही है। यह आपसी प्यार, अटूट संबंध और एकता की नींव था। पाश्चात्य संस्कृति में ऐसा देखने को नहीं मिलता। वहाँ एकाकी जीवन जीने के लिए लोग मजबूर हैं; समय किताब पढ़ने में व्यतीत होता है और कुत्ते-बिल्लियाँ ही उनके परिवार बन जाते हैं। बालिग़ होने पर बच्चे अपना स्वतंत्र जीवन जीने के लिए घर छोड़ देते हैं।

दुर्भाग्य की बात यह है कि धीरे-धीरे यही पाश्चात्य सोच और संस्कृति हमारे यहाँ भी घर करने लगी है। अब लोग “अकेला चलो” की नीति को अपनाने लगे हैं। पहले जैसा धैर्य, सहनशीलता और आपसी समझ अब कम देखने को मिलती है। कोई किसी की बात सुनना नहीं चाहता, सभी अपनी स्वतंत्रता में रहना पसंद करते हैं।

इस प्रक्रिया में हम धीरे-धीरे अपने रीति-रिवाज, परंपराएँ और संस्कृति को पीछे धकेलते जा रहे हैं। लगता है कि आज के बुजुर्ग ही इस पुरानी परंपरा और संस्कृति के साक्षी रहेंगे। आने वाली नई पीढ़ी नये विचारों और तकनीक आधारित जीवन की ओर बढ़ेगी। सोशल मीडिया और आधुनिक जीवनशैली का प्रभाव इतना प्रबल होगा कि पारंपरिक जीवन मूल्यों की जानकारी शायद केवल इतिहास की किताबों में ही रह जाएगी।

बचपन की निशानेबाज़ी और मामा जी के बाग़ में घटना

मित्रों! मैं बचपन में कुशल निशानेबाज़ भी था। गाँव में निशाना लगाने की सुविधा तो केवल ढेला फेंककर ही होती थी। आम, कैथा, इमली, बेल, बेर आदि फल खेल खेल में कंकड़ मारकर मैं नीचे गिरा देता था। आम के गुच्छों में केवल पके आम पर ही निशाना लगाता था।

पेड़ों पर चढ़ने का भी खूब शौक था, चाहे जितना सीधा पेड़ क्यों न हो, बंदरों की भांति चढ़ जाता था। मामा जी के गाँव में लोग कहते थे,

“अब यह लड़का गर्मी की छुट्टियों में यहाँ आया है, अब आम किसी पेड़ में नहीं बचेंगे।”

एक दिन का वाक़या आज भी मेरी स्मृति में जीवंत है। मैं अपने चचेरे भाई अशोक भैया के साथ बाग़ में आम तोड़ने गया था। वे मुझे कंकड़ लाकर देते और मैं निशाना लगाकर आम तोड़ता। अचानक एक कंकड़ एक डाल से टकराया और विपरीत दिशा में खड़े अशोक भाई साहब के सिर पर जा गिरा। चोट बहुत गहरी थी और रुधिर बहना रुक नहीं रहा था।

कुछ समझ न पाए, तो मैंने मिट्टी डालना शुरू किया कि रुधिर बहना रुके और किसी को पता न चले। परन्तु मिट्टी डालने से कोई असर नहीं हुआ। डर और मजबूरी में हम दोनों घर लौट आये। मेरी बड़ी चचेरी मामी ने चालाकी से पूरी बात संभाल ली और मामा जी तक शिकायत नहीं पहुँचने दी।

उस दिन मैं ऊपर वाले और अपनी मामी जी का दिल से धन्यवाद करता हूँ, क्योंकि डाँट खाने से बच गया था। यह घटना न केवल मेरी शरारत भरी मासूमियत दिखाती है, बल्कि बचपन की साहस और चतुराई का भी प्रमाण है।

बचपन के खेल-कूद और फ़िल्मों का शौक

मुझे बचपन में कबड्डी, कूद-कूद, वालीबाल खेलना बहुत पसंद था। स्कूल से वापस आने पर मैं दोस्तों के साथ गाँव के खुले मैदान में निकल जाता और खूब खेलता। हर खेल में जोश और उत्साह रहता।

लखनऊ में पढ़ाई के दौरान मुझे चोरी-छिपे फ़िल्में देखने का भी चस्का लग गया। मैं साइकिल से कान्यकुब्ज़ डिग्री कॉलेज जाता, रास्ते में यदि कोई नई फ़िल्म जो एक्शन और डायलॉग से भरपूर लगे, तो न चाहते हुए भी सिनेमा हॉल पहुँच जाता और फ़िल्म देखकर ही घर लौटता।

मेरे बड़े जीजा, श्रीमान रामबिलास पाण्डेय जी, भी फ़िल्म देखने के बहुत शौक़ीन थे। उनका आरा मशीन का कारख़ाना था, जिसके लिए लखनऊ आते रहते और मेरे पास ही ठहरते। एक बार हम तीनोंमैं, बड़े जीजा और स्व० श्री नन्हें पाण्डेय जीने आस-पास के तीन सिनेमाघरों में लगातार तीन फ़िल्में देखने का रिकॉर्ड बनाया। एक हाल से निकलते, दौड़कर दूसरे हाल में घुस जाते कि कहीं फ़िल्म के कुछ दृश्य छूट न जाएँ।

पहली फ़िल्म भाई अशोक जी के साथ सन् 1976 में रुदौली में चुपके से देखी थी“काल गर्ल” और उसी हाल में मनोज कुमार की दस नम्बरी। उस समय का जुनून और आनंद आज भी स्मृति में ताजा है।

समय के साथ मानव की इच्छाएँ और शौक बदलते हैं। बचपन की रुचियाँ बड़ी हो जाने पर शांत और परिपक्व हो जाती हैं। आज हम चाहे सुविधा सम्पन्न हों, महंगी गाड़ियों में घूमें, फ़ाइव स्टार होटलों में ऐश करें, या विदेशों में रहें, परन्तु बचपन की मिट्टी की खुशबू, कच्चे छप्पर वाले घर, दोस्तों के साथ गुल्ली-डंडा और कबड्डी का आनंद कहीं खो सा गया है।

भौतिक सुविधाएँ सुख देती हैं, पर उनमें आत्मिक शांति की कमी होती है। इस होड़ में हम बहुत कुछ पीछे छोड़ आए हैंवो सरलता, वो सहज आनंद, वो बचपन की मुस्कान जिसे याद कर मन को सुकून मिलता है।

परिवर्तन संसार का शाश्वत नियम है। आदि काल से यह चलता आया है और अनंत काल तक चलता रहेगा। परिवर्तन आवश्यक है, समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलाव होना ही चाहिए, परंतु अपनी संस्कृति, सभ्यता, संस्कार और पहचान को हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। इन्हें दिल से संजोकर रखना और अगली पीढ़ियों के लिए धरोहर के रूप में सौंपना हमारी जिम्मेदारी है। कहते हैंजिस देश का इतिहास सुरक्षित नहीं होता, उसकी पहचान कुछ ही दिनों में लुप्त हो जाती है।

शिक्षा

मेरी प्रारम्भिक शिक्षा मेरे गाँव के पास स्थित प्राइमरी पाठशाला अन्दीपुर से शुरू हुई थी। चूँकि मेरी बड़ी दीदी पहले से ही स्कूल जाती थी, मैं भी कम आयु में उनके साथ तख़्ती, दवात और कपड़े का सिला बस्ता लेकर स्कूल जाने लगा। दीदी के साथ स्कूल जाने से मुझे आत्मिक उत्साह और साहस मिला। यहीं से मैंने कक्षा पाँच तक की पढ़ाई पूरी की। उस समय स्कूल में स्व० श्री पारसनाथ पाण्डेय जी प्रधानाचार्य और श्री राजनारायण श्रीवास्तव जी सहायक अध्यापक थे। श्री श्रीवास्तव जी, जिन्हें हम मुंशी जी कहते थे, कुछ कड़क स्वभाव के थे, उनकी लंबी छड़ी की मार आज भी मुझे याद हैमजाल था कि कोई पाठ याद किए बिना स्कूल आता।

पाँचवीं कक्षा के बाद, गाँव से लगभग पाँच किलोमीटर दूर स्थित सरस्वती विद्या मंदिर, दक्खिन गाँव क्यार में कक्षा आठ तक की पढ़ाई की। उस समय यह स्कूल कक्षा नौ और दस के लिए मान्यता प्राप्त नहीं था और साइंस साइड की पढ़ाई की कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। केवल कुछ शिक्षक प्राइवेट तौर पर पढ़ाते थे और हाईस्कूल की परीक्षा किसी नज़दीकी मान्यता प्राप्त स्कूल से करवाई जाती थी।

मेरे परिवार के बड़े भाई स्व० श्री राम प्रकाश तिवारी जी जब मुसाफ़िर खाना तहसील स्थित इंटरमीडियेट कॉलेज में साइंस साइड पढ़ाई करने गए, तब मेरी भी वहाँ पढ़ने की इच्छा हुई। पर पिताजी ने कहा कि मैं शारीरिक रूप से छोटा हूँ और बाहर अकेले कैसे रह पाऊँगा। उन्हें चिंता थी कि खाना कौन बनाएगा, कौन खिलाएगा और मेरा ध्यान कौन रखेगा। यह मेरी तकनीकी शिक्षा के लिए एक टर्निंग प्वाइंट हो सकता था, पर छूट गया , हालाँकि अब मन में कोई मलाला नहीं है क्योंकि सभी विषय अपने आप में विशेष महत्व रखते हैं केवल उस विषय में पारंगत होना चाहिए ।

मैंने सरस्वती विद्या मंदिर में कला संकाय से प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में पढ़ाई जारी रखी और हाईस्कूल की परीक्षा रनापुर इंटर कॉलेज, हैदरगढ़, जिला बाराबंकी से दी। यहाँ मेरे एकमात्र शिक्षक स्व० श्री दुर्गा प्रसाद शुक्ला जी थे, जिनके मार्गदर्शन से मैं हाईस्कूल उत्तीर्ण हो सका। गुरुजी, आपकी शिक्षा और स्नेह के लिए मैं आजीवन आभारी रहूँगा।

हाईस्कूल उत्तीर्ण होने के बाद मुझे गाँव छोड़ना पड़ा। मैं अपने मामा जी के यहाँ दो वर्ष रहा और रूदौली स्थित इंटर कॉलेज से इंटरमीडियेट की परीक्षा पास की। यहाँ स्व० श्री रवि शंकर मिश्रा जी, संस्कृत आचार्य और पिताजी के मित्र, मेरे मार्गदर्शक बने। उनकी इच्छा थी कि मैं संस्कृत में आचार्य बनूँ। उनका सानिध्य पाकर मैं इस विषय में और पारंगत हुआ। आगे चलकर उनके सहयोग से मेरे घर पर स्थित पिताजी के बनवाए शिवमंदिर की स्थापना और पूजन करवाया, जिसमें मैं यजमान बना।

स्कूल में मेरे पीटी शिक्षक भी विशेष थे। सुबह सुबह पीटी कराते, कड़ा अभ्यास करवाते और बात-बात पर डांटते। उनकी आदत थी कि वे थैली में भूने चने रखते और अभ्यास के दौरान चबाते रहते। बच्चों में उत्सुकता और अनुशासन बनाए रखने का यह उनका अनूठा तरीका था।

गुरुजी का दिव्य आशीर्वाद

अपने मामा जी के यहाँ का एक वाक़या मुझे आज भी याद है। एक दिन मैं वहाँ द्वार पर बिछी चारपाई पर बैठकर अपनी पढ़ाई कर रहा था, तभी देखा कि एक श्वेत वस्त्रधारी, लंबी सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा जी अचानक पधारे। एक हाथ में कमंडल और दूसरे में त्रिशूल था। उनकी ललाट पर मैं जैसे मंत्रमुग्ध हो गयाएक दिव्य तेज और आत्मा की आभा उनके चेहरे से झलक रही थी। आज के साधुओं में तो ऐसी आभा कहीं दिखाई नहीं देती; ज़्यादातर ढोंगी साधु बन गए हैं।

मेरी नानी ने बाद में बताया कि यह हमारे परिवार के पुराने गुरुजी हैं, जो साल में एक-दो बार ही आशीर्वाद देने घर आते हैं। उनके स्वागत के लिए हम अन्न, वस्त्र और धन का भेंट समर्पित करते थे।

नानी ने गुरुजी से कहा, “गुरुजी, ज़रा मेरे इस बच्चे का हाथ देखिये। शरीर में तो इसके जैसे जान ही नहीं है। यह अपनी ज़िन्दगी में क्या करेगा?”

गुरुजी ने मेरी ओर देखा और बिना हाथ देखे ही बोले

“आप लोग व्यर्थ की चिन्ता न करें। यह बालक अपनी लगन और परिश्रम से बहुत ऊँचाई तक जाएगा। इसके ललाट में बहुत ऊर्जा दिखाई देती है। इसका भविष्य उज्जवल और विचारशील होगा।”

उनकी बातें सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। मैं उस समय आर्ट साइड से पढ़ रहा था और साइंस साइड न पढ़ पाने का मन ही मन दुख था। मैंने सोचायह कैसे संभव होगा? भगवान ही जाने! उनकी बातों पर विश्वास करना मेरे लिए कठिन था।

फिर भी, गुरुजी के शब्दों ने मेरे मन में आशा की किरण जगा दी। आज सोचता हूँ, गुरुजी ने जो कहा था, वह पूरी तरह सत्य हुआ। तपस्या की अपनी ऊर्जा होती है, और मानव तपबल से असंभव को संभव बना सकता है। गुरुजी ने मेरे भविष्य का सही अनुमान लगाया।

आज मैं मानता हूँ कि वे सच में सफल तपस्वी और विद्वान गुरु थे। आपकी विद्वता और श्रेष्ठता को मैं शत्-शत् नमन करता हूँ, आदरणीय गुरु वर।

उच्च शिक्षा की ओर पहला कदम

इंटरमीड्येट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद यह सवाल सामने आया कि आगे की पढ़ाई कहाँ से की जाए, क्योंकि उस समय रूदौली में कोई डिग्री कॉलेज उपलब्ध नहीं था। गाँव के एक मेरी दीदी जी उनके पति और मेरे जीजा श्री अरुण कुमार तिवारी जी बिजली विभाग, लखनऊ में बड़े बाबू के पद पर तैनात थे। मेरे पिताजी ने मुझे उनके यहाँ रहकर बी.ए.करने के लिए भेजा।

यह मेरे जीवन का पहला अवसर था जब घर से बाहर, मैं लखनऊ जैसे बड़े शहर में पहुँचा। मुझे आज भी याद है कि मेरे पिताजी ने मुझे वहाँ छोड़ते समय आँखों में आँसू लिए थे। बच्चों का माता-पिता के प्रति प्यार कितना गहरा होता है, यह मैं उस समय महसूस कर पाया।

लखनऊ में कान्यकुब्ज डिग्री कॉलेज में आर्ट साइड से दाख़िला लिया। विषय थेहिन्दी साहित्य, अंग्रेज़ी साहित्य और राजनीति शास्त्र। उस समय संस्कृत के एक प्रवक्ता ने मेरे इंटरमीडियेट में अच्छे अंक देखकर पिताजी से कहा कि मुझे संस्कृत विषय लेना चाहिए। उनका कहना था कि यह भविष्य में मेरे लिए अच्छा रहेगा। उस समय मैंने सोचा कि संस्कृत तो केवल शास्त्री या आचार्य बनने के लिए है, और सरकारी नौकरी पाने में मदद नहीं करेगी, इसलिए मैंने संस्कृत को त्याग दिया। आज सोचता हूँ, यह धारणा ग़लत थी; किसी भी विषय में विशेषज्ञता हमेशा मूल्यवान होती है।

स्नातक की पढ़ाई के साथ-साथ मैंने सायंकालीन टाइपिंग और अंग्रेज़ी शॉर्टहैंड कोचिंग भी ज्वॉइन कर ली। उस समय और भी कई कोर्स उपलब्ध थे, लेकिन सही जानकारी न होने के कारण मैं उनका लाभ नहीं उठा पाया। इस अनुभव से मुझे यह शिक्षा मिली कि जीवन में कैरियर सलाहकारों और मार्गदर्शन की कितनी अहमियत होती है।

मैं हमेशा आभारी रहूँगा

• आदरणीय श्री अरुण कुमार तिवारी जी और दीदी विजय कुमारी जी, जिन्होंने मुझे अपने घर पर आश्रय दिया और पढ़ाई में हर संभव सहयोग किया।

• श्री सीतानाथ पाण्डेय साहब, दीदी, और अन्य सहयोगियों का जिन्होंने मेरी शिक्षा में सहयोग किया और मार्गदर्शन किया।

• मेरे गाँव के स्व० श्री कमला प्रसाद शुक्ला जी, जिन्होंने छोटे स्कूल से बेसिक शिक्षा अधिकारी तक अपने निष्ठा और परिश्रम से पहुँचे, उनसे मुझे संघर्ष और लगन का प्रेरक संदेश मिला।

• उनके छोटे भ्राता ओमप्रकाश शुक्ला जी, जो मेरे बड़े भाई समान और जिगरी मित्र रहे, उनसे भी सहयोग और सीखने का अवसर मिला।

इन सभी के उपकार और मार्गदर्शन के बिना मेरा यह सफर संभव नहीं होता।

स्नातक के बाद एम.ए. और एल.एल.बी. का निर्णय

सन 1978 में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मैंने लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. अंग्रेज़ी साहित्य में दाख़िला लिया। प्रथम दिन ही जब मैं अंग्रेज़ी की कक्षा में पहुँचा, तो पता चला कि इस विषय में केवल 10-15 विद्यार्थी ही प्रवेश लिए थे।

अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर महोदय आते ही हम सभी को तंजपूर्ण और कड़ा संदेश दे गए

“बच्चों! सोच-समझकर आए हैं न? मटरगस्ती बिल्कुल नहीं चलेगी। यह अंग्रेज़ी साहित्य है, इतिहास-भूगोल या सामान्यज्ञान नहीं कि रट्टा मारा और पास हो जाएँ। अंगेजी में एम.ए. विरले ही करते हैं। यदि आप यहाँ नेतागीरी करने आए हैं तोपुनर्विचार कर लें, माँ-बाप का पैसा बर्बाद मत करें।”

उनका यह व्यंगात्मक एक घंटे का व्याख्यान उस रात मेरी यादों में तीर की तरह गूंजी। मैं पूरी रात सोच में पड़ गया कि कहीं मैंने ग़लत रास्ता तो नहीं चुना, या अपना समय व्यर्थ तो नहीं बर्बाद कर रहा।

काफी विचार मंथन के बाद मैंने अंग्रेज़ी एम.ए. को छोड़कर अपने भविष्य के व्यावहारिक विकल्प पर ध्यान केंद्रित किया। मैंने दो-तीन मित्रों के साथ के.के.सी. में चल रही सायंकालीन पाली में एल.एल.बी. का त्रैवर्षीय कोर्स ज्वॉइन कर लिया। मेरा विचार था कि ज़िन्दगी में चाहे सरकारी नौकरी न भी मिले, कम से कम काला कोट पहनकर वकील तो बन ही जाऊँगा।

पिता जी की कमाई से जो एक फ़ीस चली गई, वह मैंने उन्हें नहीं बताई। यदि बता देता तो निश्चित रूप से डाँट पड़ती, पर इस निर्णय ने मेरे पेशेवर जीवन की दिशा ही बदल दी।

ससुराल पक्ष

मेरी शादी ग्राम पूरे, सरोतरमऊ, डाकखाना रामपुर जनक, ज़िला अयोध्या (पूर्व नाम बाराबंकी) में आदरणीय स्व० श्री रामपाल तिवारी जी की सुपुत्री गंगामनी तिवारी जी के साथ हुई। मेरे ससुर जी अपने समय के जाने-माने ज़मींदार रहे। लंबे चौड़े क़द काठी, रूआबदार चेहरा और जमीदाराना ठाठ-बाठसमाज में उनकी अच्छी-खासी प्रतिष्ठा थी। वे घोड़ों के बड़े शौकीन थे और घुड़सवारी में माहिर। उनके हाथ में चाबुक होते ही घोड़ा हवा में उड़ने लगता, ऐसा लगता था।

मेरी शादी तय कराने में मुख्य भूमिका मेरी नानी स्व० श्रीमती राधिका मिश्रा जी ने निभाई। वे लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में कार्यरत, कड़क स्वभाव वाली, ईमानदार और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला थीं। किसी की धौंस सुनना उनकी आदत में नहीं था। मुझे याद है, वे मोहल्ला ऐशबाग़, लखनऊ आकर मुझसे मिलीं, जब मैं रिश्तेदार के घर पर रह रहा था। उन्होंने मेरी पढ़ाई और स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली और आशीर्वाद स्वरूप कहा

“बेटा! शारीरिक रूप से तुम कमजोर हो, खूब खाया-पिया करो।”

घर लौटकर उन्होंने सभी को बताया कि मैं स्वभाव से अच्छा, होनहार लड़का हूँ, पढ़ाई में मेहनती हूँ। शायद सोचा होगा कि बिटिया जाएंगी, खिलाकर “पट्ठा” कर देंगी। आज सोचता हूँ, उनके प्यार और सम्मान के बिना शायद यह मार्ग इतना सहज न होता।

मेरी सासु माँ, श्रीमती सावित्री देवी जी, भी अपनी माँ की तरह समझदार, कर्मशील और कुशल गृहणी रही हैं। मुझे हमेशा सम्मान देती हैं। पुराने समय में दामाद को जो इज्जत मिलती थी, वह आज भी वैसी ही मिलती है। मजाल है मैं खड़ा रहूँ और वे बैठ जाएँ! हर समय मेरा ध्यान रखना उनकी आदत रही। मैंने कई बार कहा, “आप वृद्धा हैं, आपकी सेवा करनी चाहिए।” पर वे कहतीं

“दामाद से सेवा करवा कर मुझे नर्क नहीं जाना।”

ससुर जी भी मुझे पैर नहीं छूने देते थे। यदि चरण स्पर्श के लिए झुकता, तो तुरंत दोनों हाथ पकड़ लेते। यही आदर्श मैंने अपने दिमाग में रखा हैअपने दामाद से चरण न छूवाना, भानजों और बेटियों से भी चरण स्पर्श न कराना ।

मेरे बड़े साले स्व० श्री गंगा शंकर तिवारी जी का दो वर्ष पूर्व कैंसर से निधन हो गया। विधाता के सामने किसी की कहाँ चलती है। उनकी आत्मा को ईश्वर शांति प्रदान करे। अब घर की ज़िम्मेदारी उनके बेटे अमित तिवारी पर आ गई, जिसने इसे भलीभांति निभाया।

मेरे छोटे साले श्री गंगा सागर तिवारी जी बहुत मिलनसार, सज्जन और सम्मान देने वाले हैं। समाज में उनकी प्रतिष्ठा है और वे मेरा भी बहुत सम्मान करते हैं। उनके प्रेम और स्नेह का अनुभव देखकर लगता है कि रिश्तों को निभाना वास्तव में क्या होता है। उनके पुत्र अनुराग तिवारी भी पिता के पदचिह्नों पर चल रहे हैं, पूरे परिवार की खेती-पाती और धार्मिक कार्यभार संभाल रहे हैं।

ससुराल परिवार धार्मिक अनुष्ठानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता हैकथा, भागवत आदि आयोजन होते रहते हैं। उनके जीवन में ख़ुशहाली और समाज में सम्मान की दृष्टि से ये परिवार अनुकरणीय हैं।

मेरी शादी और धर्मपत्नी

एक दिन पिताजी ने कहा “बेटा! एक अच्छा रिश्ता आया है, नज़दीक का, समझा-बूझा। इसे गँवाना ठीक नहीं होगा।हाँ कर दो। शादी के साथ-साथ पढ़ाई भी करते रहना।” उस दौर में लड़के की सहमति या असहमति का उतना महत्व नहीं होता था। बड़े-बूढ़ों के द्वारा दिये गये वचन से मुकरना आसान नहीं था “प्राण जाय पर वचन न जाई” वाली सोच गहरे तक बसी थी।

उस समय शादियाँ लड़के की कमाई देखकर नहीं, बल्कि उसके परिवार की हैसियत, खेती-खलिहान, पक्का मकान, बैलों की जोड़ी, और पढ़ाई-लिखाई देखकर तय होती थीं। लड़का-लड़की का मिलना या देखना आवश्यक नहीं समझा जाता थासब कुछ रिश्तेदारों, मध्यस्थों और भगवान भरोसे चलता था। मैं भी इसी परंपरा का हिस्सा बना।

आख़िरकार वह शुभ दिन आया और 17 मई 1979 को मैं विवाह के बंधन में बंधा। उसी दिन मेरी श्रीमती जी मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनीं।

यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे एक सुन्दर, सुशील, सौम्य, गुणी और आदर्श जीवनसंगिनी मिली। उनके चरण रज से मेरे घर में प्रवेश होते ही जैसे मेरे कैरियर और भाग्य के सभी द्वार अपने आप खुलते गये। सरकारी नौकरी मिली, घर-परिवार में खुशियाँ आईं और दाम्पत्य जीवन सुखपूर्वक आगे बढ़ा।

बच्चों के लिए वे केवल माँ ही नहीं, बल्कि एक आदर्श मार्गदर्शक भी सिद्ध हुईं। उनके संस्कारों ने बच्चों को आकाश में उड़ते पक्षियों के समान पंख दिये। आज सभी बच्चे अपने-अपने कैरियर के उच्च शिखरों तक पहुँचे हैं और विदेशों में कार्यरत हैंयह सब उनके समर्पण और त्याग का ही परिणाम है।

सच कहूँ तो मैं तो केवल नौकरी करता था, परंतु परिवार का पालन-पोषण, बच्चों की पढ़ाई, उनका सर्वांगीण विकास और समाज का सभ्य नागरिक बनाने का संस्कार मेरी धर्मपत्नी ने दिया।

व्यंजन बनाने में तो उन्हें महारथ हासिल है। बच्चों से लेकर रिश्तेदार तक, सब उनके हाथ के बनाए अलग-अलग स्वादिष्ट व्यंजनों की प्रतीक्षा करते रहते हैं। उनका सबसे बड़ा गुण है किसी का बुरा मत सोचो, ग़रीबों का भला करो, ईर्ष्या-द्वेषमत रखो और पूरे परिवार को जोड़कर चलो। यही तो एक आदर्श नारी का धर्म होता है।

हाँ, मेरी एक आदत है कि मज़ाक़ में कभी-कभी उनकी कोई नुक्ताचीनी कर देता हूँयह केवल चुहुलबाज़ी और मनोरंजन के लिए होता है, ताकि परिवार में एक हल्का-फुल्का और हँसी-खुशी का वातावरण बना रहे। लेकिन हकीकत यही है कि उनके बिना मेरा जीवन एक उजड़ी हुई बगिया की तरह हो जाएगा, जिसमें जीवन की कोई ख़ुशबू न रहेगी।

कहते हैं कि जीवन के अंतिम पड़ाव में पति-पत्नी ही एक-दूसरे के सच्चे साथी होते हैं। भले ही बीच में कितने ही अंतर्विरोध क्यों न रहे हों, पर संकट की घड़ी में साथ वही निभाते हैं। यह सच्चाई अक्सर हमें थोड़ी देर से समझ आती हैजब तक बहुत-सा अमूल्य समय बीत नहीं जाता।

दो अंजाने एक दिन मिलते, प्रणय सूत्र में बंधते हैं,

आपस में अजनबी दोनों, दाम्पत्य पथ पर चलते हैं।

एक राह के पथिक हैं दोनों, साथ-साथ ही बढ़ते हैं,

एक-दूजे की मन की भाषा, बिना कहे ही समझते हैं।

संग-साथ रहकर बातें करें तो राह सुखद हो जाती है,

इक-दूजे के बिना अब पल, वर्षों जैसे लग जाते हैं।

एक-दूजे पर मिटने को दोनों आतुर रहते हैं,

गुँथ जाता है प्रेम का धागा, जब प्रेम डोर बंध जाते हैं।

सारा जीवन सुखमय बीते, नव-सृजन वे करते हैं,

कर्म-पथ पर आगे बढ़ते, फूलों-से वे खिलते हैं।

अटूट प्रेम उनका है इतना, कितना प्यारा नाता है,

प्रेम पुरातन ही तो है, जन्म-जन्म के लिए जुड़ जाता है।

मित्रों, यही मेरी वैवाहिक यात्रा की कहानी हैकुछ खट्टी, कुछ मीठी बातें; कभी तकरार, तो कभी मुस्कान। यही तो दाम्पत्य जीवन का वास्तविक सुख है।

अब, चूँकि ससुराल पक्ष पहले ही विस्तृत हो चुका है, इसलिए यहाँ पर विराम देना उचित समझता हूँ।

नौकरी एवं मित्र गण

सेवाकाल ( अप्रैल 1981 - 31 जुलाई 2018 )

मैंने अपने पूर्ण सेवाकाल में एक वर्ष पोद्दार सेल्स कारपोरेशन (एक प्राइवेट कंपनी ), लगभग 36 वर्ष उ० प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम व एनटीपीसी में बिताये और 31 जुलाई 2018 को एनटीपीसी झज्जर हरियाणा से वरिष्ठ कार्यकारी सचिव समक्ष वरिष्ठ प्रबंधक (ई5) के पद से सेवानिवृत्त हुआ ।

मेरे जीवन में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की ललक बचपन से ही रही। लखनऊ में पढ़ाई के साथ-साथ मैं ट्यूशन पढ़ाता था और उससे अपना मासिक खर्च उठाता था। जब मेरी श्रीमती जी मेरे साथ आ गईं, तो मैंने सांध्यकालीन एलएलबी की पढ़ाई के साथ-साथ लाटूश रोड, लखनऊ स्थित मे० पोद्दार सेल्स कारपोरेशन में नौकरी शुरू की। उस समय वेतन अधिक नहीं था, परंतु अपने खर्च के लिए पर्याप्त था।

मैं साधारण जीवन शैली अपनाता था। मोहल्ला कोरियाना, आलमबाग, लखनऊ में दो कमरों का किराए का घर लिया। पहला वेतन मिला तो मैंने पिता जी के हाथ में रख दिया, और उन्होंने अखंड रामायण पाठ बैठाकर इसे प्रभु के चरणों में अर्पित किया।

इस कम्पनी में मेरे ब्रांच मैनेजर श्री वाई. सी. पाराशर साहब का मैं आज भी हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने एक अनुभवहीन व्यक्ति को कार्यालय के काम करने के तरीके सिखाए। साथ ही अन्य मित्रगण – वैद्य जी, पारिख जी, सूद जी, पाण्डेय जी, शुक्ला जी – भी मेरे जीवन में प्रेरणास्रोत रहे।

प्राइवेट नौकरी मेरे लिए केवल तात्कालिक खर्च निकलने का साधन थी। मुझे सरकारी नौकरी की लालसा थी। सुबह शॉर्टहैंड की कोचिंग, तत्पश्चात नौकरी और सायंकाल कान्यकुब्ज डिग्री कालेज, लखनऊ में एलएलबी की कक्षाएँ – यही मेरी रोज़मर्रा की दिनचर्या थी। सरकारी नौकरी पाने के लिए मैं लगातार रिक्तियों के लिए फार्म भेजता और इंटरव्यू देता रहा। जीवन में सफलता पाने के लिए निश्चित लक्ष्य, दृढ़ आत्मशक्ति और प्रेरणादायक उदाहरणों से सीखना आवश्यक है। जैसा कि कहा गया है –

“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।”

जीवन में सब्र, कर्तव्य में ईमानदारी और परिश्रम का फल सदैव मीठा होता है और बड़ों की कृपा से कर्मशील व्यक्ति के पास सभी सुख, वैभव और लक्ष्मी का स्वत: आगमन होता है और मेरे साथ भी कुछ ऐसे ही संयोग हुआ , एक दिन शाम को आफिस से घर आने पर मेरी श्रीमती जी ने बताया कि आज एक पोस्टमैन रजिस्ट्री लेकर घर आया था और मेरे अनुरोध करने पर भी उसने डाक मुझे नही दी और बोला कि जिसके नाम की रजिस्ट्री है उन्हीं को दूँगा ।

शाम को जब मैं आफिस से घर वापस आया तो मेरी धर्मपत्नी ने मुझसे कहा कि कहीं उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम में जो आपने टेस्ट दिया था वहां से नियुक्ति पत्र तो नहीं आया है । उनकी ये बात मुझे भी सोचने पर मजबूर कर रही थी क्योंकि यह टेस्ट मेरे हिसाब से काफी अच्छा गया था और अगर सोर्स सिफ़ारिश न चली हो तो नियुक्त की मुझे काफी संभावना थी, परन्तु मन में एक खटका था कि नही ऐसा नही होगा, भला बिना सोर्स सिफ़ारिश के कहीं सरकारी नौकरी मिलती है वह भी बिजली विभाग में, क्या करते, वह पूरी रात उसी उधेडबुन में बिना सोये कट गयी ।

सुबह आठ बजे ही मैं चन्दन नगर, आलमबाग पोस्ट आफिस पहुँच गया और उस डाकिये का पोस्ट आफिस खुलने से पहले ही इन्तज़ार करता रहा कि डाक लेकर कही दूसरी एरिया में बाँटने हेतु न चला जाये । अचानक डाकिया महोदय सामने आते हुये दिखे और मैने लपककर अपना लिफाफा माँगा ।उसने कहा - सुबह सुबह बोहनी कराओ महाराज, इस लिफ़ाफ़े में जरूर कुछ ख़ास है । मेरे अन्दर व्यग्रता तो थी ही, मैने जेब से पांच का नोट उसे थमाया और अपना लिफ़ाफ़ा ले लिया और खोलता हूँ तो हे प्रभो !! तेरा लाख लाख शुक्रिया, उसके अन्दर उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लि० का ‘अंगेजी स्टेनोग्राफर’ पद के लिये नियुक्ति पत्र ही था और मुझे रायबरेली में एक माह के अन्दर ज्वाइन करना था । मैं 12 अप्रैल 1982 को ऊंचाहार थर्मल पावर प्रोजेक्ट में शामिल हुआ और पहले माह की पगार लगभग ₹650/- थी, जो उस समय पर्याप्त था।

कर्मस्थली – ऊँचाहार

ऊँचाहार, रायबरेली ज़िले की वह पुण्य भूमि, जहाँ पर मेरे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण 23 वर्ष बीते। यहीं मेरे बच्चों ने जन्म लिया, यहीं वे बड़े हुए, यहीं नया आशियाना बसा और जीवन ने नई दिशा पाई। सच कहूँ तो ऊँचाहार केवल कार्यस्थल नहीं, मेरे जीवन की आत्मा बन गया।

आदरणीय श्री जे.पी. मिश्रा जी का सान्निध्य

मेरे कार्यकाल का असली मोड़ तब आया जब मुझे तत्कालीन अधीक्षण अभियंता श्री जे.पी. मिश्रा जी को रिपोर्ट करने का अवसर मिला। तपस्वियों जैसा तेजस्वी व्यक्तित्व, अनुशासनप्रियता और कार्यकुशलताये सब उनके व्यक्तित्व के अविभाज्य अंग थे। उनका इतना रुतबा था कि बड़े-बड़े नेता और विधायक तक उनके चरण स्पर्श किए बिना नहीं रहते थे।

उन्होंने मुझ पर इतना विश्वास जताया कि करोड़ों के ठेकों पर मेरे हस्ताक्षर बिना पढ़े ही स्वीकृत कर देते थे। यह भरोसा मेरे लिए जिम्मेदारी का रूप ले चुका था और मुझे मजबूर कर देता था कि मैं हर तकनीकी और वित्तीय बारीकी को समझूँ और उसमें दक्ष हो जाऊँ।

न्यायालय से सीख

ऊँचाहार के दौरान न्यायालय के कई मामलों की पैरवी का उत्तरदायित्व भी मुझे मिला। इस दौरान मैंने सीखा कि न्यायपालिका का असली चेहरा केवल कोर्टरूम में नहीं, बल्कि उसके बाहर की “सेटिंग” और “प्रणाली” में छिपा होता है। नामी अधिवक्ता भी यहाँ विफल हो जाते थे, वहीं स्थानीय वकील अपनी पहुँच और व्यवहारकुशलता से मामलों को निपटा देते थे।

यही अनुभव मुझे जीवन का एक बड़ा सबक सिखा गयाकानून की किताबें जितनी जरूरी हैं, उतना ही जरूरी है व्यवहार और सही व्यक्ति की पहचान।

श्री जे.पी. मिश्रा जी के साथ बिताए सात-आठ वर्ष मेरे जीवन की धरोहर हैं। आज भी उनका आशीर्वाद मेरे साथ है। ईश्वर उन्हें स्वस्थ और दीर्घायु बनाए रखे।

ऊँचाहार – मेरी भावनाओं का आशियाना

ऊँचाहार परियोजना केवल मेरी कर्मस्थली ही नहीं रही, बल्कि मेरी व्यक्तिगत और पारिवारिक ज़िंदगी की जन्मभूमि भी बनी। यहीं मेरे तीनों प्यारे बच्चों ने इस दुनिया में पहला श्वास लिया, यहीं उनकी किलकारियाँ गूँजीं, यहीं उन्होंने दोस्त बनाए और पढ़ाई की। पैतृक घर भले ही सुल्तानपुर रहा हो, पर मेरे बच्चों के लिए असली जन्मस्थली और आत्मिक लगाव की धरोहर हमेशा ऊँचाहार ही रहा।

आज भी मेरे बच्चे दुनिया के जिस भी कोने में हैं, उनका आपसी संबंध ऊँचाहार से ही बँधा हुआ है। उन्होंने अपने मित्रों के साथ “ऊँचाहार ग्रुप” नामक व्हाट्सऐप समूह बनाया है, जिसमें सब जुड़े रहते हैं, यादें साझा करते हैं और बचपन की मित्रता को जीवित रखे हुए हैं।

आत्मीय रिश्ते और दोस्ती

सिर्फ बच्चे ही नहीं, हमारे जीवन के सबसे आत्मीय मित्र भी ऊँचाहार में ही बने। यहाँ की दोस्ती केवल सहकर्मी स्तर की नहीं रही, बल्कि पारिवारिक रिश्तों जैसी गहरी और आत्मिक रही। सुख-दुख में साथ देने वाली यह मित्रता आज भी उतनी ही प्रगाढ़ है।

मेरे ख़ास मित्रों में सर्वश्री सुधाकर पाण्डेय जी, वी.एस. बिष्ट साहब, आर.के. मिश्रा जी, आर.के. अरोड़ा जी, विजय हिमांशु सिन्हा जी, के.के. पाण्डेय जी, वाई.के. शर्मा जी, स्वर्गीय बी.बी. सिंह जी, आर.डी. सिंह जी, स्वर्गीय एच.के. श्रीवास्तव जी, एस.सी. गुप्ता जी, सुशील अग्रवाल जी, ललित मिश्रा जी, सुभाष यादव जी, अशोक मिश्रा जी, मुनीश मिश्रा जी आदि प्रमुख रहे। धीरे-धीरे समय ने अपनी गति दिखाई, और कई मित्र मंच से विदा हो गये। उनके नाम से पहले अब “स्वर्गीय” जोड़ना पड़ता है, परंतु वे आज भी हमारी स्मृतियों में उतने ही जीवित हैं जितने जीवनकाल में थे।

एनटीपीसी का नया अध्याय

12 फरवरी 1992 का दिन ऊँचाहार परियोजना के इतिहास का स्वर्णाक्षरी दिन था। इसी दिन उत्तर प्रदेश राज्य के स्वामित्व से यह परियोजना एनटीपीसी के अधीन स्थानांतरित हो गई। इस परिवर्तन ने सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए नए अवसर खोलेदेशभर में कार्य करने, स्थानांतरण पाने और पदोन्नति प्राप्त करने का सुनहरा द्वार खुल गया। यह केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं था, बल्कि हम सबके करियर में एक नए युग का आरंभ था।

लोहारी नाग पाला : तपोभूमि और संघर्ष का अध्याय

वर्ष 2005 में मुझे अधिकारी संवर्ग में कार्यकारी सचिव (ई-1) के पद पर पदोन्नति मिली और मेरी पोस्टिंग उत्तरकाशी स्थित लोहारी नाग पाला हाइड्रो पावर परियोजना में हुई। यह स्थानांतरण मेरे लिए जितना सम्मानजनक था, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी।

परिवार के लिए यह एक कठिन घड़ी थी। बच्चे दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई के महत्वपूर्ण चरण में थे। नई परियोजना निर्माणाधीन थी, आवास की कोई सुविधा नहीं थी, परिवार को साथ ले जाना संभव नहीं था। ऐसे में पत्नी और बच्चों को अकेले ऊंचाहार छोड़कर निकलना आसान नहीं था। परंतु ईश्वर जो करता है, अच्छा ही करता हैयह सोचकर मैंने कर्तव्य पथ पर कदम बढ़ाया।

चार वर्षों तक मुझे घर-परिवार से दूर रहना पड़ा। उस बीच मेरी धर्मपत्नी श्रीमती गंगामणि त्रिपाठी जी ने जिस त्याग, धैर्य और साहस के साथ बच्चों की शिक्षा व परवरिश की जिम्मेदारी उठाई, वह मेरे जीवन का सबसे उज्ज्वल अध्याय है। लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद जैसी जगहों पर बच्चों को लेकर अकेले जाना, उनकी पढ़ाई में लगातार साथ देना और प्रेरित करते रहनायह सब कार्य उन्होंने सहज भाव से निभाए। सच ही कहा गया है कि पत्नी को गृहलक्ष्मी ऐसे ही नहीं कहा जाता। मैं उनके इस समर्पण का आजीवन ऋणी हूँ।

पहली झलक उत्तरकाशी की

ऊंचाहार से अवमुक्त होकर मैं अपने दो साथियोंश्री अजयपाल, सहायक अभियंता और श्री जी.सी. त्रिपाठी लेखाधिकारी के साथ उत्तरकाशी के लिए रवाना हुआ। ऋषिकेश से आगे बढ़ते ही जब हम चंबा पहुँचे, तो घने बादलों और अंधेरे ने पहली बार हमें पहाड़ों की भयावहता का अनुभव कराया। टूटी-फूटी, घुमावदार सड़कों से गुजरते हुए जब हम उत्तरकाशी पहुँचे, तो लगा मानो किसी युद्ध-क्षेत्र में आ गए हों।

एनटीपीसी ने वहाँ अधिकारियों के लिए अस्थायी व्यवस्था की थी। शुरुआत में हमें होटल नीलकंठ और बाद में होटलअस्सी गंगा में ठहराया गया। अगले दिन हम लोहारी नाग पाला साइट पहुँचे। वहाँ केवल दो बड़े शेड और एक छोटा-सा महाप्रबंधक कक्ष था। मुख्य प्रबंधक मानव संसाधन विभाग श्री अरविंद भारद्वाज जी तो तंबू में ही कार्यालय चलाते थे। ऊंचाहार के सुख-सुविधापूर्ण जीवन से सीधे इस तंबू-जीवन में आना मानो स्वर्ग से नर्क में पटक दिए जाने जैसा लगा।

हम तीनों साथी चाय की एक गुमटी पर बैठे सोच रहे थे कि वापस ऊंचाहार जाकर पूर्व पद पर ही रहना बेहतर होगा। मुख्य प्रबंधक श्री अरविंद भारद्वाज जी से मुलाक़ात हुई और आप बोले“भाइयों अब वापसी का कोई विकल्प नहीं है। हम सबको मिलकर यह परियोजना आगे बढ़ानी है।“ उनकी बातें सुनकर हिम्मत बँधी और हमने कार्यभार ग्रहण कर लिया।

तपोभूमि का अनुभव

धीरे-धीरे हमारी मानसिकता बदलने लगी। गंगा माँ के पावन तट पर स्थित यह परियोजना हमें तपोभूमि जैसी लगने लगी।

सुबह मंदिरों की घंटियाँ, हर-हर गंगे की गूँज, भागीरथी का कल-कल बहता निर्मल जल, और साधुओं की तपस्याइन सबने मन को शांति और बल प्रदान किया। गंगोत्री धाम और उत्तरकाशी के मंदिरों का दर्शन जीवन का अमूल्य अनुभव बन गया।

परियोजना का दुखद अंत

परंतु दुर्भाग्य यह रहा कि चार-पाँच वर्षों बाद अरबों रुपये खर्च हो जाने के बावजूद इस परियोजना को पर्यावरण प्रदूषण के नाम पर बंद कर दिया गया। यह निर्णय न केवल परियोजना पर कार्यरत हजारों लोगों के प्रयासों के साथ अन्याय था, बल्कि देश की ऊर्जा आवश्यकताओं पर भी आघात था। पास ही मनेरी और टेहरी परियोजनाएँ चल रही थीं, तो फिर केवल लोहारी नाग पाला क्यों? यह प्रश्न आज भी चुभता है।

सीख और अनुभव

इस परियोजना ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। वरिष्ठ अधिकारियोंश्री आर. कृष्णामूर्ति, श्री कमलेश गुलाटी, स्वर्गीय वी.एन. यादव, स्वर्गीय टी.एन. श्रीवास्तव, श्री ए.के. शर्मा आदिके साथ काम करने का अवसर मिला। साथ ही अनेक मित्रों का स्नेह और सहयोग भी जीवन की अनमोल पूँजी बना।

मेरे विचार में जो लोग स्थानांतरण से कतराते हैं, वे स्वयं और अपने परिवार को नई संभावनाओं से वंचित कर देते हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना तभी जीवित रहती है जब हम नए स्थानों, नए मित्रों और नए अनुभवों के लिए खुले दिल से आगे बढ़ें।

चार वर्षों के इस प्रवास में मुझे गंगोत्री और बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। दायरा बुग्याल, डोडीताल, यमुनोत्री, केदारनाथ, मसूरी और हरिद्वार जैसे स्थलों ने इस प्रवास को अविस्मरणीय बना दिया।

एनसीआर, नई दिल्ली : नए अवसरों का अध्याय

लोहारी नाग पाला, उत्तरकाशी की तपोभूमि में चार वर्ष बिताने के बाद अगस्त 2009 में मेरा स्थानांतरण हाइड्रो रीजनमुख्यालय, नोएडा कर दिया गया। यह मेरे लिए एक नया अध्याय था क्योंकि पहली बार मुझे राजधानी दिल्ली और एनसीआर में कार्य करने का अवसर मिला।

परियोजना स्थल पर काम करने और मुख्यालय में कार्य करने में बहुत अंतर होता है। परियोजनाओं में दायित्व अधिकतर तकनीकी और संचालनात्मक होते हैं, जबकि मुख्यालय में दृष्टिकोण व्यापक होता हैविभिन्न परियोजनाओं से तालमेल, वरिष्ठ अधिकारियों के साथ संवाद और संगठनात्मक नीतियों की गहराई से समझ। नोएडा आने पर मेरे संबंधों का दायरा विस्तृत हुआ। एनटीपीसी की विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े अनेक साथियों से परिचय हुआ और कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से सीधे मिलने का अवसर मिला। यह मेरे करियर के लिए अत्यंत समृद्ध अनुभव रहा।

दिल्ली प्रवास ने मेरे निजी जीवन को भी नए रंग दिए। नए साथी, नया एनटीपीसी परिवार, नया आशियाना और बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा-सुविधाएँ मिलीं। बड़ी बेटी आस्था को यहीं से टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ में नौकरी मिली और उसी दौरान उसकी शादी भी दिल्ली में ही संपन्न हुई। छोटी बेटी आकृति ने भी दिल्ली से ही कोचिंग की और आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गई। इस प्रकार, दिल्ली केवल मेरी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की प्रगति और संभावनाओं की भूमि सिद्ध हुई ।

आदरणीय श्री अरविन्द कुमार साहब, तत्कालीन अधिशासी निदेशक, हाइडो मुख्यालय का मैं दिल से शुक्रगुज़ार हूँ , आपने मुझे हर स्तर पर सहयोग दिया और मेरा मार्गदर्शन किया । अन्य मित्रों में सर्व श्री राहुल पाण्डेय साहब, भंडारी जी, के एम बाबू जी, तलवार साहब, के के सिंह साहब , मोहिन्दर सिंह साहब, ए के सिंह जी,आदि तमाम लोग रहे हैं ।

अरावली पावर कम्पनी प्रा. लि. (APCPL), नोएडा और झज्जर परियोजना : सेवा का स्वर्णिम अध्याय

अक्टूबर 2010 में मेरा स्थानांतरण हाइड्रो रीजन, नोएडा से होकर अरावली पावर कम्पनी प्राइवेट लिमिटेड (APCPL) में हुआ। यह कंपनी एनटीपीसी, दिल्ली सरकार और हरियाणा सरकार की संयुक्त स्वामित्व वाली इकाई थी। नोएडा मुख्यालय में मैंने वर्ष 2010 से 2015 तक सेवाएँ दीं। यह कालखंड मेरे जीवन का अत्यंत शानदार और यादगार समय रहा।

एपीसीपीएल ने मुझे केवल पेशेवर ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी अनेक नए और मूल्यवान संबंध दिए। यहाँ पर आदरणीय अरविंद कुमार साहब के साथ ही मैं आया था, और उनके अतिरिक्त सर्वश्री पाधा साहब, पी. के. गुप्ता साहब, आर. एन. पाण्डेय साहब, अग्निहोत्री जी, ग्रोवर जी, सदाशिवन जी, सिन्हा जी, गैनोत्रा जी, स्व. नारंग जी, वी. के. गर्गसाहब, अजय कछवाहा जी, ए. के. गुप्ता जी, वी. के. पाण्डेय जी, भोजवानी जी, ए. के. जायसवाल जी, प्रशांत गुप्ता, सुश्री माला जी, महुआ भुवाल जी आदि से मेरा मधुर संबंध रहा। ये सभी मित्र आज भी उसी आत्मीयता से जुड़े हुए हैं।

झज्जर परियोजना : स्मृतियों का अनमोल अध्याय

सन् 2015 में मेरा स्थानांतरण नोएडा मुख्यालय से एपीसीपीएल की ही परियोजना इन्दिरा गांधी सुपर थर्मल पावरप्रोजेक्ट, झाड़ली (झज्जर, हरियाणा) पर कर दिया गया। यहाँ पर मैंने लगभग तीन वर्ष बिताए और यहीं से एनटीपीसीकी सेवा से 31 जुलाई 2028 को सेवानिवृत्त हुआ।

झज्जर प्रवास मेरे जीवन का अत्यंत शांतिपूर्ण और सुखद काल रहा। यहाँ मुझे आदरणीय एस. के. सिन्हा साहब, एन. एन. मिश्रा साहब (सीईओ, एनटीपीसी झज्जर) और श्री राजकुमार साहब (महाप्रबंधक) के साथ काम करने का सुअवसर मिला। उनका मार्गदर्शन और सहयोग मेरे लिए हमेशा प्रेरणादायक रहा।

आदरणीय एन. एन. मिश्रा साहब साक्षात् एक युग पुरुष हैं। आपके कुशल नेतृत्व और दूरदर्शिता में एनटीपीसी कीझज्जर पावर परियोजना ने हरियाणा में विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में प्रथम श्रेणी प्राप्त की। परियोजना की 500-500 मेगावाट की तीनों इकाइयाँ आपके ही मार्गदर्शन में एक-एक करके दौड़ने लगीं। आपके सूक्ष्म प्रबंधन (micro management), कार्यकुशलता, त्याग और संघर्ष परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता रहे।

एक स्मरणीय प्रसंग

आदरणीय मिश्रा साहब के साथ का एक सुखद संस्मरण मुझे आज भी उतनी ही ताजगी से याद है। मेरी बेटी आकृतिअमेरिका से लौटी थी और एक दिन झज्जर की कालोनी के मंदिर में चल रहे एक धार्मिक कार्यक्रम में अपनी मम्मी के साथ खड़ी थी।

आपकी तीक्ष्ण और बारीक नज़रों ने तुरंत यह भाँप लिया कि यह शायद मेरी बेटी हो सकती है। चूँकि मैंने आपको उसके झज्जर आने की कोई जानकारी नहीं दी थी (हाँ, उसकी पढ़ाई और अमेरिका में नौकरी के विषय में आप भलीभाँति जानते थे), इसलिए आप पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे।

आपने तत्काल स्व. श्री अनिल कुमार जी ( उप महाप्रबंधक, मानव संसाधन) को सत्यापन के लिए भेजा। उन्होंने आकृति से उसके पिता का नाम पूछा। जैसे ही मेरा नाम लिया गया, वे स्वयं भी चौंक पड़े और जाकर आपको बताया “सर, येतो आपके त्रिपाठी जी की बेटी हैं।”

बस फिर क्या थाआपने आकृति का स्वागत मुख्य अतिथि की भाँति कराया। वहाँ उपस्थित सैकड़ों वरिष्ठ अधिकारियों और कालोनी की महिलाओं से उसका परिचय करवाया और उसकी प्रशंसा के गुणगान किए। आपने सबको बताया कि यह वही बिटिया है जो अमेरिका से एम.एस. कर चुकी है और वर्तमान में माइक्रोसॉफ़्ट में कार्यरत है। आपके इस सम्मान और स्नेह से मेरा पूरा परिवार आजीवन आपका ऋणी रहेगा।

पारिवारिक आत्मीयता

आपके परिवार से हमारे परिवार के रिश्ते आज भी उतने ही घनिष्ठ बने हुए हैं। हम दोनों ही परिवार नोएडा में रहते हैं और समय-समय पर मिलते रहते हैं। मैडम जी का सहज, सौम्य और सरल जीवन अपने आप में अनुकरणीय है।

आपकी सुपुत्री डा. पूर्णिमा जी और दामाद जी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, का भी विशेष उल्लेख करना चाहूँगा। पिछले वर्ष हमारे गुजरात भ्रमण के दौरान दोनों ने हमें अतुलनीय स्नेह और सम्मान दिया। पूरे गुजरात का वी.वी.आई.पी. दर्शन कराना उनके आत्मीय व्यवहार का प्रमाण था। सचमुच, यह आपके पुण्य प्रभाव और श्रेष्ठ संस्कारों का ही परिणाम है कि आपको इतने सुयोग्य संतान प्राप्त हुए।

ईश्वर आपके परिवार पर अपनी कृपा सदा बनाए रखे और जीवन की हर खुशी आपकी झोली में सदैव भरता रहे।

मित्रों का स्नेह

झज्जर परियोजना के तीन वर्षों में मुझे अनेकों सच्चे मित्र और सहकर्मी मिले। इनमें प्रमुख हैं

सर्वश्री : रवींद्र सर, डा. प्रभात कुमार जी, डा. खरे साहब, डा. सहगल, डा. पुरुषोत्तम, आशीष शर्मा, विनय गर्ग जी, पी. कुमार जी, अरोड़ा जी, अरुण कुमार जी, सुमन ढींगरा जी, गुजराल जी, त्यागी जी, लोलार्क शुक्ला जी, एल. डी. पाण्डेयजी, सुधीर जी, संजय जी आदि।

इन सभी का अपनत्व और साथ मेरे हृदय में हमेशा जीवित रहेगा।

गृहस्थ जीवन और परिवार

मानव जीवन के पूरे अंतराल में अनगिनत कहानियाँ जन्म लेती हैंकुछ सुखद, तो कुछ दुखद। रास्ते में अनेक प्रकार के लोग मिलते हैंभिन्न सोच वाले, अलग वेशभूषा, रहन-सहन और भाषा वाले। परंतु यह भी सत्य है कि दिल सबमें होता है, प्रेम सबमें होता है। जब साथ रहना पड़ता है तो आत्मीयता स्वाभाविक रूप से आ ही जाती है। बस आवश्यकता होती हैस्वयं को उस वातावरण में ढाल लेने की।

पति-पत्नी का साथ

पति-पत्नी की जोड़ी की तुलना बैलगाड़ी के दो बैलों की जोड़ी से की जा सकती है। दोनों समान रूप से गाड़ी खींचते हैं। किंतु यदि एक ओर का जुआ ढीला हो जाए तो गाड़ी असंतुलित हो जाती है। यही स्थिति हमारे गृहस्थ जीवन की भी होती हैजिसमें पति-पत्नी के बीच, पूरे परिवार, रिश्तेदारों और मित्रों के साथ तालमेल बैठाना अनिवार्य होता है तभी संबंध मधुर बनते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।

रिश्तों का उतार-चढ़ाव

जीवन में रिश्ते जुड़ते भी हैं और टूटते भी। स्वार्थ और लोभ रिश्तों के टूटने में मुख्य भूमिका निभाते हैंयह आज की ही नहीं, सदियों पुरानी सच्चाई है। जब भगवान श्रीराम जैसे आदर्श पुरुष भी कैकेयी के कुचक्र का शिकार हो गए, तब हम तो साधारण मानव हैं।

रिश्तों को बचाने में वाणी की भी बड़ी भूमिका होती हैमधुर वाणी बोलने वाला सबका चहेता बन जाता है, जबकि कड़वी वाणी सीधा दिल को घायल करती है। यही कारण है कि शिक्षा और संस्कार व्यक्ति को विनम्र बनाते हैं और समाज में उसकी पहचान को निखारते हैं।

अभिभावक का कर्तव्य

मेरे जीवन का मूल उद्देश्य अपने बच्चों को सही शिक्षा और संस्कार देना रहा है। मैं ईश्वर को साक्षी मानकर कहता हूँ कि मैंने अपने सभी बच्चों को एक ही दृष्टि से देखा हैकभी कोई भेदभाव नहीं किया।

मेरा विश्वास रहा है कि हर अभिभावक का नैतिक कर्तव्य है कि वह अपने बच्चों के लिए ऐसा मार्ग प्रशस्त करे, जो उन्हें संस्कारवान, शिक्षित और उन्नत विचारों वाला बनाए। ताकि वे न केवल अपने परिवार, बल्कि देश और समाज के लिए भी योगदान दे सकें।

प्रेरणा स्रोत

मेरे जीवन की प्रेरणा महापुरुषों के जीवन से आई है। उनके जीवनचरित्र यह सिखाते हैं कि कठिनाइयों से कैसे जूझा जाए, असफलता को सफलता में कैसे बदला जाए और महानता के पथ पर कैसे बढ़ा जाए।

महापुरुषों की जीवनी केवल इतिहास नहीं हैवे एक प्रेरणा-स्रोत हैं, जो हर चुनौती को अवसर में बदलने की दिशा दिखाते हैं।

मेरा पुत्र विजय त्रिपाठी

अक्टूबर 16, 1983, रविवारविजयादशमी का पावन दिन। स्थान: ग्राम पूरे भोजा तिवारी, डाकखाना- शुकुल बाजार, जिला- सुल्तानपुर, हमारे पिताजी स्व० श्री रामनरेश त्रिपाठी जी का आवास।

भगवान भोले भण्डारी की कृपा से इस दिन हमारे परिवार में पुत्र का आगमन हुआ। पूरे घर में ख़ुशियाँ दौड़ पड़ीं, ढोल पीटे गए और मिठाइयाँ बाँटी गईं। यही लगा कि भगवान राम के आशीर्वाद स्वरूप उनका अंश पुत्र रूप में त्रिपाठी परिवार में आया। पिताजी ने उनका नाम विजयशंकर त्रिपाठी रखा और घर में प्यार से उसे रिंकू भी पुकारने लगे।

बचपन से ही विजय नटखट, प्यारा और परिवार का लाड़ला रहा। कुछ महीनों बाद ऊंचाहार परियोजना कालोनी में आवास मिल जाने पर वह हमारे साथ रहने आया। शुरुआती दिनों में उसकी बीमारियाँ हमें बहुत कष्ट देती थीं, परन्तु ईश्वर की कृपा, पूजा-पाठ और बड़ों के आशीर्वाद से समय के साथ उसकी सेहत मजबूत हुई।

खेल और रूचियाँ

विजय को बचपन से ही क्रिकेट का विशेष शौक था। ऊंचाहार के घर की चहारदीवारी पर ही वह बैटिंग करता और बल्ला लेकर अभ्यास करता। हमारे मित्र श्री अनुज निगम साहब ने एक दिन मुझे सलाह दी कि उसकी इस रूचि को प्रोत्साहित करें, क्योंकि यह उसका जुनून है।

शिक्षा और करियर

विजय की प्रारम्भिक शिक्षा डीएवी कालेज, एनटीपीसी ऊंचाहार से हुई। इंटरमीडियट तक की पढ़ाई यहीं पूरी हुई। इसके बाद उसने आई टी एस, ग़ाज़ियाबाद से बीसीए किया और तत्पश्चात आई एम टी कालेज, नागपुर से एमसीए की शिक्षा प्राप्त की।

आई टी सी, नागपुर के कैम्पस से चयनित होकर उसने पुणे की कंपनी ऐज़्टेकसाफ्ट में लगभग दो वर्ष कार्य किया। कंपनी के बाद माइंडट्री द्वारा अधिग्रहण होने के बाद विजय को अमेरिका स्थित कार्यालय, सिएटल में स्थानांतरण मिला। वहाँ कुछ वर्षों तक उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद, उसे विश्व की शीर्ष आई टी कंपनी माइक्रोसॉफ़्ट ने पहचान दी। 2010 में माइक्रोसॉफ़्ट, यूएसए में चयन होने पर विजय वहाँ अपनी सेवाएँ देने लगा। आज वह इस कम्पनी में कई पदोन्नतियाँ प्राप्त कर वरिष्ठ पोजीशन पर कार्यरत है।

बहू सन्ध्या त्रिपाठी

सन् 2011 में मेरे बेटे विजय की शादी बहू सन्ध्या त्रिपाठी से हुई, वह भी सुशिक्षित है और मुंबई के एक टाप इंजीनियर कालेज से एमसीए की हुई है, प्रतिभा वान है, तकनीकी ज्ञान अच्छा है, माइक्रोसॉफ़्ट में कार्यरत है और अब तो वह हमारे त्रिपाठी परिवार का हिस्सा है । नौकरी के साथ साथ अपनी गृहस्थी को भी सुचारु रूप से चला रही है । दोनों का वैवाहिक जीवन सुखद सफल और मंगल मय चल रहा है । ईश्वर से प्रार्थना है उसका दाम्पत्य जीवन सुखमय रहे ।

प्यारी पोती सान्वी उर्फ़ शोनू

भगवान जगन्नाथ की कृपा से मार्च 21,2018 को त्रिपाठी परिवार में मेरी पौत्री के रूप में माँ लक्ष्मी का पदार्पण हुआ, मेरी शोनू ! तुम तो हमारे परिवार की प्राण हो ! भगवान जगन्नाथ से बहुत मन्नतों के बाद प्राप्त हुई हो, वह भी नव रात्रि के शुभ दिनों में पधारी, इसीलिये तुम्हारा नामकरण भी माँ लक्ष्मी के नाम पर ही सान्वी त्रिपाठी रखा गया ।अब तो तू सात वर्ष की हो गयी है, द्वितीय कक्षा में जा चुकी है । तेरी विशेष रुचि जिमनास्टिक, आर्ट्स और तैराकी में ज्यादा मुझे समझ में आ रहा है, तैराकी में तो कई मेडल भी ले आयी है, बहुत ही चंचल, उछल कूद में माहिर और एक जगह स्थिर न बैठने की स्वभाव वाली तू लगती है । मेरा आशीर्वाद यही है कि खूब पढ़ो लिखो, संस्कारी बनो और जीवन में सुन्दर मुकाम बनाओ और परिवार का नाम रोशन करो ।

बेटी आस्था त्रिपाठी

मेरी बेटी आस्था का जन्म 9 सितंबर, 1989 को ऊंचाहार में हुआ। घर में भैया को एक छोटी सी बहन मिली और हमें प्यारी बेटी का सुख प्राप्त हुआ। उसका नाम प्यार से आस्था त्रिपाठी रखा गया। आस्था बहुत ही सुशील, कोमल, सरल स्वभाव वाली और प्रतिभाशाली लड़की है।

आस्था ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने भाई विजय के साथ डीएवी, ऊंचाहार से प्राप्त की। इंटरमीडियेट तक उसने भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित और बायोलॉजी भी पढ़ा, जिससे उसके लिए मेडिकल और इंजीनियरिंग दोनों रास्ते खुले थे। पढ़ाई में तेज़ होने के बावजूद, उसकी सरल सोच और संयमित दृष्टिकोण हमेशा प्रभावित करता रहा। मैं तो चाह रहा था कि वह डाक्टर बने, परन्तु भाग्य उसे इंजीनियर बनने का ही था। आस्था ने युनाइटेड इंजीनियरिंग कालेज, इलाहाबाद से कंप्यूटर साइंस में बी.टेक किया और वर्तमान में टीसीएस में कार्यरत हैं।

आस्था की सोच हमेशा सादगी और संतोष पर आधारित रही। कबीरदास जी का यह दोहा उनके लिए बिल्कुल सटीक बैठता है –

“साईं इतना दीजिये तामें कुटुम्ब समाय,

मैं भी भूखा न रहूँ, साधू भी भूखा न जाये”

आस्था इसी सिद्धांत पर कायम हैं और इन दस-पंद्रह वर्षों में उन्होंने कभी नौकरी बदलने का विचार नहीं किया। टीसीएस को उनकी वफादारी और मेहनत के लिए विशेष आभार व्यक्त करना चाहिए।

सन् 2014 में दिसम्बर माह में आस्था की शादी नोएडा में सम्पन्न हुई। मेरे दामाद श्री सिद्धार्थ त्रिपाठी सिविल इंजीनियर हैं और अपनी फैक्ट्री का संचालन कर रहे हैं। मेरे समधी आदरणीय विवेक कुमार त्रिपाठी जी, एनटीपीसी से महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं ।

नातिन कास्वी (बेबो)

मेरी छोटी प्यारी नातिन कास्वी त्रिपाठी, जिसे हम प्यार से बेबो कहते हैं, मुझे पप्पी बुलाती है। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि मेरी बेटी मुझे पापा कहती थी, तो कास्वी ने मुझे पप्पी कहकर याद रखा।

कास्वी मेरे लिए प्राणों से भी प्यारी है। उसकी मधुर मुस्कान और चंचल स्वभाव घर में खुशियों का संचार करता है। उसकी चहकती हँसी और खेल-खिलाड़ी अंदाज हमारे दिलों को हमेशा आनंदित करता है। मेरा आशीर्वाद है कि वह हमेशा स्वस्थ, खुश और जीवन में सफलता प्राप्त करे। ईश्वर का आशीर्वाद हमेशा उसके साथ बना रहे। वह मुझसे इतना घुली मिली है कि मेरे साथ ही चिपकी रहना चाहती है ।

बेटी आकृति त्रिपाठी

मेरी बेटी आकृति, घर में प्यार से मोना के नाम से जानी जाती है, का जन्म 22 फ़रवरी, 1992, रायबरेली में हुआ। कुछ मित्रों ने मुझसे मज़ाक किया कि त्रिपाठी जी तो दूसरा लड़का चाहते थे, लेकिन सच यह है कि मैंने अपने जीवन में कभी लड़का या लड़की में कोई भेद नहीं माना। समान सुख-सुविधा, समान प्यार और समान शिक्षा मेरे जीवन के सिद्धांत रहे हैं। आज भी सभी बच्चे यही मानते हैं।

आकृति बहुमुखी प्रतिभा की धनी, शिक्षा में हमेशा अव्वल रही। उसका व्यवहार सौम्य, उच्च विचारशील और परिवार के लिए मित्रवत रहा। वह हमेशा हमारी सलाह मानती है और अपने विचार भी स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है। एक बार जब मेरी तबियत खराब हुई, तो आकृति रातों-रात अमेरिका से दौड़कर आई और मेरा ध्यान रखा। पड़ोसियों ने भी कहा कि मैं बहुत ही भाग्यशाली हूँ कि मुझे ऐसी संस्कारी और प्यार करने वाली संतान मिली।

शिक्षा और उपलब्धियाँ

आकृति ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने बड़े भाई और बहन के साथ डीएवी स्कूल, ऊंचाहार से प्राप्त की। प्रत्येक कक्षा में वह अपने आप को प्रथम स्थान पर रखती और हर विषय में उत्कृष्ट अंक प्राप्त करती। हाईस्कूल और इंटरमीडियट में उसने साइंस और गणित के लिए अतिरिक्त रिफ्रेशर किताबें मँगाईं और पूरी लगन से पढ़ाई की।

इंटरमीडियट के बाद उसने कमला नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, सुल्तानपुर से बी.टेक, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में शिक्षा प्राप्त की। वह परीक्षा में प्रथम स्थान पर रही और गोल्ड मेडलिस्ट रही। इसके उस समय के विभागाध्यक्ष श्री सिन्हा जी ने उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की।

कई मित्रों ने उसे सिविल सेवा की तैयारी करने की सलाह दी, लेकिन आकृति ने ईमानदारी और स्वाभिमान के साथ पेशेवर जीवन चुनने का निर्णय लिया। इसके बाद उसने नार्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी, यूएसए में अध्ययन किया। वहाँ उसके बड़े भाई और भाभी पहले से ही माइक्रोसॉफ्ट में कार्यरत थे, जिन्होंने उसकी मदद की।

सन् 2017 में आकृति ने एम.एस. की डिग्री प्राप्त की और वर्तमान में Microsoft, यूएसए में उच्च पद पर कार्यरत हैं।

विवाह और परिवार

आकृति की शादी 11 दिसम्बर, 2019 को तन्मय शर्मा से हुई। तन्मय भी अमेरिका से डबल एम.एस. डिग्री प्राप्त, संस्कारी, व्यवहार कुशल और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी हैं। दोनों का वैवाहिक जीवन सुखद और मंगलमय चल रहा है।

दुख की बात यह रही कि मेरे प्रिय समधी स्व० कर्नल लव शर्मा साहब का असमय निधन हो गया। उनके बिना परिवार में शून्यता महसूस होती है, लेकिन उनके संस्कार और आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ हैं।

नातिन सिया

अब हमारे परिवार में सिया नाम की प्यारी नातिन भी आ चुकी है। वह मेरी चुलबुली और मस्त गुड़िया है। यूएसए में रहते हुए भी वह मेरे समय को आनंदमय बनाती है और मेरे साथ खेल-खिलवाड़ में शामिल होती है। उसका हंसता चेहरा और चंचल स्वभाव घर में खुशियों का संचार करता है। सिया भी मुझे अपने से अलग नही होना चाहती हर समय नानू नानू का नाम ही रटती रहती है

मेरी आकृति और सिया को मैं ढेर सारा आशीर्वाद और प्यार देता हूँ। ईश्वर हमेशा इनके जीवन में स्वास्थ्य, सफलता और खुशियाँ बनाए रखें।

मास्टर सचिन

मास्टर सचिन हमारे परिवार के लिए एक अनमोल सदस्य हैं। संभवतः वर्ष 2015 में, जब मैं एनटीपीसी झज्जर में कार्यरत था, तब वह हमारे पास आया और तभी से मेरे साथ ही रह रहा है। मैंने उसे अपने एक और बेटे की तरह स्वीकार किया। भले ही वह पाठक परिवार में जन्मा, पर संस्कार, शिक्षा और जीवन मूल्यों की शिक्षा उसने हमारे परिवार से ही पाई।

मैंने अपने जीवन के अनुभव उसे साझा किए, उसे सभी अवसर, प्लेटफ़ॉर्म और सुख-सुविधाएँ दीं, ताकि वह जीवन में आगे बढ़ सके। यही मार्गदर्शन उसके जीवन का आधार बना और आज वह आईटी कंपनी कग्नीजेंट में कार्यरत है।

सचिन नोएडा में मेरा सहारा भी है; घर की देखरेख और जिम्मेदारियाँ वह ईमानदारी और परिश्रम के साथ निभाता है। उसका जीवन, समर्पण और मेहनत यह साबित करता है कि परिश्रम का फल मीठा होता है। मैं दृढ़ विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि सचिन अपने लगन और जुनून के बल पर जीवन में बहुत आगे बढ़ेगा।

मेरी शुभकामनाएँ उसके लिए यही हैं – खुश रहो, उन्नति करो, और जीवन मंगलमय हो।

मेरे बच्चों और परिवार के प्रति भावनाएँ

मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है कि मुझे ऐसे संस्कारी, मेहनती और प्यार करने वाले बच्चे मिले। उनके जीवन में सफलता, परिवार में सहयोग और समाज में आदर्श बनना मेरे लिए गर्व का विषय है। मेरे बच्चों ने शिक्षा, संस्कार और कड़ी मेहनत से अपने जीवन को उत्कृष्ट बनाया और समाज के लिए प्रेरणा बने।

ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि मेरे बच्चे, उनके जीवन साथी और संतान सभी स्वस्थ, सुखी और मंगलमय जीवन बिताएं

मेरे सपने

अपना एक छोटा सा परिवार होगा

एक नया संसार होगा,

खेलेंगी खुशियाँ घर आँगन में

आपस में खूब प्यार होगा

ये ही तो मेरे सपने थे,

पति-पत्नी बैठे बुनते रहते थे।

आज समय वो आया है,

ख़ुशियों को पा मन हर्षाया है,

देख रहा हूँ बच्चों को,

याद कर रहा अपने उन सपनों को,

सपने सब पूरे दिखते हैं

अपना एक छोटा सा परिवार होगा,

एक नया संसार होगा।

बैठा मंद मंद मुस्काता हूँ,

अपने भाग्य पर इतराता हूँ,

मन मेरा हर्षाता है

प्रभु के श्री चरणों में शीश नवाता हूँ

कुछ तो मैंने सत्कर्म किये होंगे,

ये पुण्यफल जो पाया है।

सब सुखी रहे, आनंदित हो,

आशीर्वाद बड़ों का पाया है,

हर्षित हूँ देख कर ये खुशियाँ,

अपना एक छोटा सा परिवार होगा,

एक नया संसार होगा।

ये ही तो मेरे जीवन की कुल अर्जित पूंजी है

ये ही तो मेरे पूर्वजों के

आशीर्वाद का सुंदर फल है

दाम्पत्य सुख का सार यही,

ये ही प्रेम संसार है।

अपना एक छोटा सा परिवार होगा

एक नया संसार होगा,

खेलेंगी खुशियाँ घर आँगन में,

आपस में खूब प्यार होगा।

साहित्यिक क्षेत्र में भूमिका

मेरी अध्ययन और लेखन में रुचि बचपन से ही रही है। मेरे पिताजी स्वंय ही विद्यालय के प्रधानाचार्य थे और उनका व्यक्तित्व, गुण और संस्कार मेरे जीवन के मार्गदर्शन का आधार बने। घर में पढ़ाई, नाट्य-कला और साहित्यिक गतिविधियों का वातावरण मेरे व्यक्तित्व के विकास में सहायक रहा।

गाँव में आयोजित रामलीला में मैं बार-बार प्रभु राम का पात्र निभाने का सौभाग्य पाता रहा। मेरे पिताजी न केवल कुशल नाटककार थे, बल्कि संवाद लेखक भी थे और उनकी लिखावट इतनी स्पष्ट और सुंदर थी कि देखने में प्रिंटेड प्रतीत होती थी। इसी पृष्ठभूमि ने मुझे साहित्य, संस्कृति और कला के प्रति गहरा प्रेम सिखाया।

एनटीपीसी में नौकरी के दौरान भी मैं सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग लेता रहा। नौकरी की व्यस्तताओं के बावजूद यह रुझान मेरे भीतर कभी फीका नहीं पड़ा।

31 जुलाई 2018 को जब मैंने एनटीपीसी से सेवानिवृत्ति ली, तब मुझे जीवन की दूसरी पारी की दिशा तय करनी थी। किसी नौकरी में लौटने का विचार नहीं था, परंतु सामाजिक सेवा और साहित्यिक गतिविधियों में योगदान देने का मन था, तभी मुझे अपनी पुरानी साहित्यिक रुचि की याद आई।

बचपन में मुझे सूरदास, रसखान, तुलसीदास, मीराबाई और कबीरदास जैसी संत-कवियों की भक्ति रस धारा बहुत प्रिय थी। उनके भजनों और कविताओं ने मेरे मन को संवेदनशील बनाया। उपन्यास, समाचार पत्र, साहित्यिक पत्रिकाएँ जैसे कादम्बिनी, पाँचजन्य, और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन मेरा शौक रहा। महाभारत की पूरी कथा मैंने इंटरमीडिएट में पढ़ते समय पूरी तरह आत्मसात कर ली थी।

लेखकों के जीवन से मुझे प्रेरणा मिली कि सृजनशीलता के लिए प्रेरणा, अभ्यास और दृढ़ संकल्प अनिवार्य हैं। उनकी जीवनी पढ़कर मैंने स्वयं में लेखन की इच्छा जगी। माँ शारदे की कृपा से मेरी लेखनी स्वतः चलने लगी। फ़िलहाल मैं छंद-मुक्त रचनाएँ लिख रहा हूँ, क्योंकि इससे मेरे मन के भावों को अभिव्यक्त करना सरल और सहज होता है।

साहित्य मेरे लिए एक अथाह सागर है। जितना तैर सको, उतना ही अनुभव मिलेगा; उसकी गहराई कभी पूरी तरह नापी नहीं जा सकती। जीवन में सीखने की लालसा और सृजन की इच्छा हमेशा बनी रहनी चाहिए। यही विश्वास और आशा है कि मेरी लेखनी धीरे-धीरे साहित्यिक क्षेत्र में अपनी जगह बनाएगी।

साहित्यिक जीवन और उपलब्धियाँ

मेरी पहली पुस्तक “उमा वाणी” हाल ही में, 25 जून को दीप साहित्य प्रकाशन, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित हुई, जिसके संपादक आदरणीय दिनेश गोरखपुरी जी हैं। इसी क्रम में, अखिल भारतीय सर्व भाषा संस्कृति समन्वय समिति की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका “प्रज्ञान विश्वम” ने मेरे व्यक्तित्व और कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित किया, जिसमें देश विदेश के जाने-माने 17 विद्वानों और साहित्यकारों ने मेरे जीवन पर अपने लेख प्रस्तुत किए। इसके लिए मैं सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों का हृदय से आभारी हूँ, विशेषकर ग्लोबल अध्यक्ष पंडित सुरेश नीरव जी और आदरणीया मधु मिश्रा जी।

मेरी साहित्यिक यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था मेरा पहला एकल लाइव काव्य पाठ, जो 3 मार्च 2023 को विश्व स्तरीय अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के पटल पर आयोजित हुआ। इसे संपन्न कराने में आदरणीय पंडित सुरेश नीरव जी और श्री श्रृषि सिन्हा जी की महती भूमिका रही। तब से मेरी यह साहित्यिक यात्रा अनवरत जारी है और मैं सैकड़ों लाइव कार्यक्रमों में शिरकत कर चुका हूँ। इस दौरान मैंने अनेक साहित्यिक मित्र बनाए, जिनसे मुझे नया परिवार और परिवेश मिला। आज मैं अपनी शेष जिंदगी इसी साहित्यिक परिवेश में बिताने का इच्छुक हूँ।

मैं अपने परम मित्र और प्रेरक आदरणीय सत्य प्रकाश सिंह जी, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, डिग्री कालेज, प्रयागराज का हृदय से आभारी हूँ, जिनकी प्रेरणा से मैंने लेखन क्षेत्र में कदम रखा। इसी प्रकार मैं श्री किशोर सैनी जी, सुश्री टीना कुमारी बिटिया (संस्थापक माँ शारदे काव्य मंच), श्री श्री मिश्रा जी (संस्थापिका अंतर्राष्ट्रीय मंच सुर संगम काव्य गंग धारा), मीनाक्षी भारद्वाज जी, और आदरणीय अनुज श्री दिनेश गोरखपुरी जी (प्रकाशक, दीप साहित्य संस्थान, गोरखपुर) का भी कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करता हूँ, जिनका निरंतर सहयोग मुझे मिलता रहा।

साहित्यिक क्षेत्र में मुख्य धारा में मेरा अनुभव अभी लगभग 7–8 वर्ष का ही है, परंतु मुझे ऐसा लगता है मानो मेरा आप सभी साहित्यकार मित्रों से पुराना नाता रहा है। समय के साथ मेरे साहित्यिक मित्रों की संख्या बढ़ी है और एनटीपीसी के पुराने मित्र धीरे-धीरे पीछे रह गए।

साहित्य मेरे लिए एक माध्यम है जिसके द्वारा मैं समाज और विश्व में घटित घटनाओं से प्रेरणा लेकर, अपने विचारों और संवेदनाओं को साझा कर सकता हूँ। मेरी लेखनी का यह आरंभिक दौर है, अभी बहुत कुछ सीखना और लिखना है, लेकिन मेरे मन में यह दृढ़ विश्वास है कि निरंतर प्रयास और सृजन ही साहित्य की असली राह है।

आज तक मेरी लगभग 20 काव्य साझा संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं, कई कहानियाँ विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, और मुझे कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया। मेरे ब्लाग पर लगभग 400 रचनाओं का संग्रह उपलब्ध है, और मैं निरंतर कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूँ।

मैं भगवद् चर्चा एवं साहित्य साधना मंच का संस्थापक हूँ। इस मंच में लगभग 1300 भगवद् प्रेमी जुड़े हैं और दिन प्रतिदिन संख्या बढ़ती जा रही है। यहाँ सभी सदस्य अपने विचार साझा करते हैं और हम सभी लाभान्वित होते हैं।

इसके अतिरिक्त, मैं कवि के नाम से फेसबुक पेज पर अपनी स्वरचित रचनाएँ पोस्ट करता हूँ, जहाँ लगभग सात हज़ार साहित्यकार मित्र जुड़े हुए हैं और उनका स्नेह और आशीर्वाद मुझे निरंतर प्रेरणा देता है।

अध्यात्म और आत्मचिंतन

मित्रों! अध्यात्म शुरू से ही मेरा प्रिय विषय रहा है। बचपन से ही मुझे आत्म-चिंतन की प्रवृत्ति रही है। समय-समय पर मैंने अपने जीवन के अनुभवों, परिवार, मित्रों और समाज से प्राप्त सबक पर ध्यान दिया है। अब मैं अपने अंदर झाँकने और अपने जीवन के उद्देश्य पर विचार करने का प्रयास करता हूँ।

हम स्वयं से यह प्रश्न क्यों न करें

“मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, आगे कहाँ जाना है और आने का उद्देश्य क्या है?”

इस गुत्थी को सुलझाना आसान नहीं है, कारण है माया का बंधन। इस बंधन में हम इतने उलझे रहते हैं कि अपने लिए समय ही नहीं निकाल पाते, और प्रभु भजन का अवसर भी दुर्लभ हो जाता है।

मेरे दृष्टिकोण में जीवन सरिता के प्रवाह जैसा है। जल निरंतर बहता रहता है, कभी किसी तट पर पहुँचता है, तो कहीं आगे जाकर बिछड़ जाता है। इसी प्रकार मानव जीवन भी स्थान, काल और शरीर के परिवर्तन में सतत चलता रहता है। यही प्रकृति का विधान है। हमारे कर्म ही हमारा भाग्य निर्माण करते हैं। कर्मों का विधान अटल है। कहते हैं, परमात्मा स्वयं कर्म से बंधा नहीं, फिर भी कर्मों का पालन करता है।

कर्म और न्याय

त्रेता युग में रामावतार में भगवान राम ने बालि को वृक्ष की आड़ में वाण मारकर न्याय स्थापित किया। उसी कर्ज का निर्वाह उन्होंने द्वापर युग में कृष्णावतार में किया। इसी प्रकार रामावतार में नारद के गर्व को चूर करने के लिए वानर का रूप लिया गया। ये दृष्टांत हमें बतलाते हैं कि जीवन में प्रत्येक कर्म का फल और न्याय अनिवार्य है।

भौतिकता और वैराग्य

पहले जब लोग अपनी हैसियत का बखान करते थे, तो मुझे स्वयं पर ग्लानि होती थी। ईर्ष्या नहीं, पर स्वयं के पास न होने का दुख महसूस होता था। इतने फ्लैट, महँगी गाड़ियाँ, अकूत धनसोचता था, काश मेरे पास भी होता। जीवन भर संघर्ष में उलझा रहा।

पर अब समझ आता है कि साधारण जीवन ही पर्याप्त है। धीरे-धीरे भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम होती है, वैराग्य भाव आता है, और हम जीवन के अंतिम पड़ाव की ओर सोचने लगते हैं। अब मुझे खुली हवा में रहना, छप्पर, चूल्हे की सोंधी रोटी और साधारण जीवन सुखद लगता है। छप्पन भोग, महँगी गाड़ियाँ नहीं चाहिएसाइकिल ही अच्छी है, पैदल चलना अच्छा लगता है।

जीवन की विविध अवस्थाएँ

हर प्राणी के जीवन के विविध रूप होते हैंशिशु, युवा, वृद्ध। यही जीवन क्रम है। हर उम्र की अपनी विशेषताएँ हैं। हमें उनमें खुशियाँ ढूँढनी हैं, जीवन की चुनौतियों से लड़ना है। चुनौतियाँ अवसर देती हैं, हार मानना नहीं, बल्कि उनका सामना करके सीखना ही जीवन का सार है।

*ये जीवन है, इस जीवन के हैं विविध रंग रूप

कभी बचपन, कभी जवाँ, कभी है वृद्धापन स्वरूप

कभी शिशु हैं, हंसते हैं, रोते हैं, झगड़ते हैं,

मस्ती है, उमंग है, बालपन का है ये चंचल रंग रूप ।

*पढ़ते हैं लिखते हैं, संघर्ष है, कसौटियाँ हैं,

हर कसौटियों में इक अवसर हैं कर्म का है ये रंग रूप

वैवाहिक बंधन है, प्रेम है, समर्पण है,

नव सृजन है, दाम्पत्य जीवन का ये सुंदर सुखद स्वरूप ।

*ख़ुशियों के रंगों में ही जीवन की ख़ुशबू है

सुख दुख की छाया में जीवन की राहें हैं,

आना है जाना है, फिर लौटना है जीवन का यही फ़साना है

इस जीवन के हैं यही विविध रंग रूप ।

आत्म मूल्यांकन और क्षमा

अपने जीवन के अनुभवों पर नजर डालते हुए मैं स्वयं को देखता हूँ। कुछ अपराध जरूर हुए होंगेशारीरिक या वाणी केजिनके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। मैं अपने माता-पिता, भाई-बहन, सगे संबंधियों और समाज के सभी श्रेष्ठ लोगों से अपने व्यवहार में हुई चूक के लिए क्षमा चाहता हूँ।

कबीरदास जी का यह दोहा मुझे इस मार्ग पर हमेशा याद रहता है

“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”

मैं स्वयं को सुधारने का प्रयास करता हूँ और मानता हूँ कि जिन मित्रों ने मेरी कमियाँ बताई, वे वास्तव में मेरे हितैषी ही हैं।

प्रकृति, अध्यात्म और जीवन का दर्शन

मेरे कुछ विशेष शौक हैंअध्ययन करना, प्रकृति में विचरण करना और ईश्वर की अद्भुत सृष्टि को आँखों में बसा लेना। प्रकृति के सानिध्य में मुझे असीम सुकून मिलता हैपत्तों में, फूलों में, कलियों में, झीलों में, पशु-पक्षियों में, सरिता की बहती कल-कल धारा में, समुद्र की लहरों में। मैं प्रभु की इस सुंदर सृष्टि को नमन करता हूँ और हर दृश्य को अपने मन में बसाने का प्रयास करता हूँ।

चिड़ियों के जीवन का अध्ययन करना मुझे बेहद प्रिय हैउनका भी अपना परिवार है, अपनी बोली है, अपनी भाषा है। मैं ईश्वर की उपस्थिति हर चेतन और अचेतन रूप में पाता हूँ।

चलता-फिरता राही

यात्रा मेरी पुरानी चाह रही है। मन की गहराइयों में हमेशा एक अजीब-सी पुकार सुनाई देती रहीचलो, कुछ नया देखो, कुछ नया जियो। परंतु सेवा काल में यह पुकार अक्सर दबी रह जाती थी। एनटीपीसी के कार्यालयीन दायित्व, सीमित अवकाश और बच्चों की शिक्षा–दीक्षा के चलते कदमों को उतनी उड़ान नहीं मिल पाती थी। कभी-कभार सरकारी दौरों में जो अवसर बनता, उतने में ही इस शौक की प्यास बुझाने का प्रयास करता।

सन् 2018 में सेवानिवृत्ति का वह दिन आया, जब ज़िम्मेदारियों का बोझ हल्का हुआ और मन के पंख खुलकर फैल गए। अब समय मेरा अपना था। तभी से यात्रा मेरी दिनचर्या बन गई। लगभग हर वर्ष मैं बच्चों के पास अमेरिका जाता हूँप्रायः छह माह का प्रवास वहीं रहता है। बाकी समय नोएडा, लखनऊ, जन्मभूमि अमेठी, रिश्तेदारियाँ और देश के विभिन्न तीर्थस्थलों में घूमता हूँ। साहित्यिक गतिविधियों में जुड़ने से देश के कोने-कोने में आने-जाने का क्रम जैसे जीवन का उत्सव बन गया।

विदेश यात्राओं की पोटली में अब तक नेपाल, सिंगापुर, लंदन, इस्तांबुल- तुर्की, अमेरिका और दुबई के मनमोहक दृश्य सहेज चुका हूँ। मेरा विश्वास है कि जब तक शरीर में चलने की शक्ति है, तब तक ठहरना नहीं चाहिए। यही कारण है कि घर पर रहते हुए भी आस-पास की हरियाली, फूल पत्तियों, जंगलों से निकलती हुई टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों और प्रकृति की नीरवता में टहलना मेरी आदत बन चुकी है।

मैं तो एक चलता-फिरता राही हूँ,

कभी इधर चला, कभी उधर चला।

जीवन की राहों पर चलते हुए,

नई दिशाओं की ओर बढ़ता चला।

सपनों की उड़ान में खो जाता हूँ,

नई उम्मीदों के साथ बढ़ता चला।

ग़म के धुएँ हवा में उड़ाता,

हर नए अनुभव को संजोता चला।

रुकना नहीं, थकना नहीं,

बस मुस्कान लिए आगे बढ़ता चला।

तारों की तरह चमकता,

जीवन की अनवरत राहों पर बढ़ता चला।

अमेरिका में हैपी फ्रेंड्स बोथल ग्रुप मेरे लिए विशेष अपनापन लिए है। लगभग तीन सौ सदस्य देश–विदेश के अलग-अलग कोनों से जुड़े हैं। वहाँ पहुँचते ही महफ़िलों की गर्माहट, पॉटलक के स्वाद, सांस्कृतिक आयोजनों की रौनक और यात्राओं की हलचल वातावरण को उत्सव में बदल देती है। वर्ष 2015 से लगभग हर वर्ष मैं इस परिवार-से समूह का हिस्सा बनता आया हूँ।

अमेरिका में सर्व श्री लखवीर सिंह जी, जीत सिंह जी, प्रदीप व्यास जी, सत्य प्रकाश सिंह जी, मोहन खोर जी, बकुल दोसी जी, डॉ. प्रजापति जी, दिनेश डोंडियाल जी, सुब्रह्मण्यम जी, गजराज सिंह जी, विनायक जी, एच.डी. कौशिक जी, जयंत मंगल जी, ओम प्रकाश पाण्डेय जी, ए के जायसवाल जी, शैलेंद्र शाह जी, सिद्धू जी, रमाकांत जी जैसे मित्रों की आत्मीयता इस यात्रा को और गहराई देती है। नाम भले सीमित लिख पा रहा हूँ, पर उनके स्नेह और मित्रता का विस्तार शब्दों से कहीं बड़ा है।

संदेश

जीवन स्वयं एक अनंत यात्रा है।

राहें बदलती रहती हैं, गंतव्य बदलते रहते हैं,

पर यात्रा का सौंदर्य उसी में है

कि हर मोड़ पर कुछ नया सीखने,

कुछ नया देखने और

कुछ नया महसूस करने का अवसर मिलता है।

रुकना केवल सांस लेने के लिए है,

ठहरना केवल मन को सँभालने के लिए है,

पर आगे बढ़ना ही जीवन का असली उत्सव है।

जब तक कदमों में शक्ति है,

मन को नई दिशाओं का आमंत्रण देते रहना

यही आत्मा की सच्ची साधना है।

नाम, पद, शोहरतये सब केवल लोक व्यवहार के लिए हैं। मत उलझो मिथ्या भ्रम में, क्योंकि यही भ्रम हमें चक्कर लगवाता है। असल में, यह सब शून्य ही है।

न मैं लेखक हूँ, न गायक, न शिक्षक, न पत्रकार। न विद्वान, न विचारक, न साधक। हाँ, मैं केवल एक पथिक हूँ। मानव शरीर में संसार में आया हुआ एक यात्री, जो निरंतर चलायमान है। पिता, भाई, पितामह, नाना, मित्रसभी पहचान खो चुके हैं।

हर सुबह, हर दिन और हर रात मेरे जीने के साक्षी हैं, जो मुझे बताते हैं“अभी कुछ कर सकते हो तो कर लो।” न किसी का मित्र, न किसी का शत्रुमैं केवल जगत का कल्याण चाहने वाला, केवल सत्य चेतन आनंद स्वरूपचिदानंद रूप हूँ।

जहाँ जाता हूँ वह मेरा घर है, जहाँ रहता हूँ वही मेरा आशियाना। उस ईश्वर का साम्राज्य ही मेरा साम्राज्य है।

राम चरित मानस वाचन का महत्व

मेरी बचपन से ही तुलसीदास कृत रामचरितमानस का वाचन करने की आदत रही है। चाहे केवल एक-दो पृष्ठ ही क्यों न पढ़े जाएँ, पढ़ते-पढ़ते मेरा मन इतना भाव-विभोर हो जाता है कि समय का पता ही नहीं चलता। रामायण के हर पात्र में मैं इस तरह रम जाता हूँ कि कभी-कभी आँसू भी आंखों से उतरने लगते हैं। विशेषकर भरत का चरित्र मुझे अत्यंत मार्मिक लगता है।

इस वाचन की आदत प्रतिदिन मुझे ऊंचाहार के माध्यमिक स्कूल के प्रधानाध्यापक स्व. श्री बाजपेयी जी ने दी थी। वे अत्यंत धार्मिक और सात्विक विचारों वाले व्यक्ति थे। उनकी यह सलाह मेरे जीवन में भक्ति भावना को बलवती करती रही और रामायण वाचन मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया।

आदरणीय बाजपेयी जी की यह भी सलाह थी कि आजकल की कीर्तन मंडलियाँ, जो चौपाइयों को तोड़-मरोड़ कर और अर्थहीन, फ़िल्मी स्टाइल में गाती हैं, उन्हें अपनाना बिल्कुल भी उचित नहीं है। उनका कहना था कि रामचरितमानस हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ है, प्रत्येक शब्द मंत्रमय है, और इसे उसी भाव से ग्रहण करना चाहिए तभी इसका वास्तविक लाभ मिलता है। मैं भी सभी मित्रों को यही सुझाव देता हूँ कि अपनी दिनचर्या में समय निकालकर धार्मिक पुस्तकों का वाचन अवश्य करें और हिन्दू संस्कृति से जुड़े रहें।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भगवद् गीता में बताये गये कर्मयोग के सिद्धांत को मैंने अपने जीवन में अपनाया है। मैं अपने कर्म में ही विश्वास करता हूँ। अपनी मेहनत की कमाई का ही उपभोग करना पसंद करता हूँ और यथासंभव गरीबों की सहायता करता रहता हूँ। मुझे इसमें आत्मिक संतुष्टि मिलती है।

मैं अपने बच्चों को भी यही सिखाता हूँ कि जीवन में चाहे जितना भी धन अर्जित हो, हमेशा सत्य और न्याय के मार्ग पर चलना चाहिए। जीवन को सरलता से जीना, अहंकार से दूर रहना, सच्चाई के पक्ष में दृढ़ रहना, किसी की हाय न लेना और असहाय व गरीबों की भरपूर मदद करना आवश्यक है। तब देखो, ईश्वर तुम्हें क्या नहीं देतातुम्हारी झोली हमेशा भरपूर होगी और तुम्हें आत्मिक संतोष भी प्राप्त होगा।

मेरे बच्चों! विपरीत परिस्थितियों में भी घबराना नहीं, सत्य पथ से कभी न हटना, और जीवन की हर स्थिति को ईश्वर की नियति समझकर स्वीकार करना।

अंत में, मैं अपने सभी शुभचिंतकों का तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूँ।

मैं कृतज्ञ हूँ हर छोटी-छोटी खुशी के लिए,

हर साधारण अवसर के लिए,

और हर उस व्यक्ति के लिए, जिसने मेरी ज़िंदगी को नई दिशा और नई रौशनी दी।

लगता है कि मैंने अपनी आत्मकथा का वर्णन धीरे-धीरे कुछ अधिक ही विस्तृत रूप में कर दिया। अतः अब यहीं इसे विराम देने का समय आया है। क्या करेंलेखनी का काम तो लिखना ही होता है। यह मेरी आत्मकथा है, जिसमें अनगिनत किस्से और कहानियाँ हैं। मैंने यथासंभव सार-सार ही लिया और इसे संक्षिप्त करने की पूरी कोशिश की है।

धन्यवाद ज्ञापन

मैं कोई प्रसिद्ध लेखक नहीं, केवल एक साधारण व्यक्ति हूँ, जिसे अपनी आत्मकथा लिखने की ललक हुई।

इस यात्रा में मेरे परमप्रिय मित्र और प्रकाशक श्री दिनेश गोरखपुरी जी का आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मेरी पहली पुस्तक “उमा वाणी” का सफल प्रकाशन किया और इस नई पुस्तक को प्रकाशित करने में मेरा मार्गदर्शन किया।

मैं अपने सभी पाठकों, मित्रों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।

आपका स्नेह और समर्थन मेरी लेखनी और जीवन दोनों के लिए अनमोल है।

कृतज्ञ हूँ हर खुशी, हर अवसर और हर उस व्यक्ति के लिए, जिसने मेरी ज़िन्दगी में नई रौशनी दी।

सादर

एक स्वतंत्र लेखक, समीक्षा कार, रचनाकार

नोएडा, उत्तर प्रदेश

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